Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 287

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
श꣡ची꣢भिर्नः शचीवसू꣣ दि꣢वा꣣ न꣡क्तं꣢ दिशस्यतम् । मा꣡ वा꣢ꣳ रा꣣ति꣡रुप꣢꣯ दसत्क꣣दा꣢च꣣ना꣢꣫स्मद्रा꣣तिः꣢ क꣣दा꣢च꣣न꣢ ॥२८७॥

श꣡ची꣢꣯भिः । नः꣣ । शचीवसू । शची । वसूइ꣡ति꣢ । दि꣡वा꣢꣯ । न꣡क्त꣢꣯म् । दि꣣शस्यतम् । मा꣢ । वा꣣म् । रातिः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । द꣣सत् । कदा꣢ । च꣣ । न꣣ । अ꣣स्म꣢त् । रा꣣तिः꣢ । क꣣दा꣢ । च꣣ । न꣢ ॥२८७॥

Mantra without Swara
शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दिशस्यतम् । मा वाꣳ रातिरुप दसत्कदाचनास्मद्रातिः कदाचन ॥

शचीभिः । नः । शचीवसू । शची । वसूइति । दिवा । नक्तम् । दिशस्यतम् । मा । वाम् । रातिः । उप । दसत् । कदा । च । न । अस्मत् । रातिः । कदा । च । न ॥२८७॥

Samveda - Mantra Number : 287
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (शचीवसू) कर्म-रूप धनवाले परमात्मा-जीवात्मा, गुरु शिष्य, अध्यापक-उपदेशक, वैद्य-शल्यचिकित्सक, राजा-राजमन्त्री, सभापति-सेनापति आदि अश्वीदेवो ! तुम (शचीभिः) अपने-अपने कर्मों से (नः) हमें (दिवा नक्तम्) दिन-रात (दिशस्यतम्) अपनी-अपनी देनें प्रदान करो। (वाम्) तुम्हारा (रातिः) दान (कदा च न) कभी (मा उपदसत्) समाप्त न हो, वैसे ही (अस्मत्) हमारे अन्दर से (रातिः) दान का गुण (कदा च न) कभी (मा उपदसत्) समाप्त न हो, अर्थात् हम भी निरन्तर दान में संलग्न रहें ॥५॥ इस मन्त्र में ‘शची, शची’, ‘राति, रातिः’, तथा ‘कदा च न, कदा च न’ में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥५॥
Essence
उक्त अश्वी-युगल जैसे अपनी-अपनी आध्यात्मिक, वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रिय, शिल्पात्मक, चिकित्सात्मक आदि देनों से हमारा उपकार करते रहें, उसी प्रकार हम भी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार दूसरों का उपकार करें ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में अश्वियुगल देवता हैं। उनसे याचना की गयी है।