Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 284

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मो꣡ षु त्वा꣢꣯ वा꣣घ꣡त꣢श्च꣣ ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्नि री꣢꣯रमन् । आ꣣रा꣡त्ता꣣द्वा सध꣣मा꣡दं꣢ न꣣ आ꣡ ग꣢ही꣣ह꣢ वा꣣ स꣡न्नुप꣢꣯ श्रुधि ॥२८४॥

मा꣢ । उ꣣ । सु꣢ । त्वा꣣ । वाघ꣡तः꣢ । च꣣ । न꣢ । आ꣣रे꣢ । अ꣣स्म꣢त् । नि । री꣣रमन् । आरा꣡त्ता꣢त् । वा꣣ । सधमा꣡द꣢म् । स꣣ध । मा꣡द꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । ग꣣हि । इह꣢ । वा꣣ । स꣢न् । उ꣡प꣢꣯ । श्रु꣣धि ॥२८४॥

Mantra without Swara
मो षु त्वा वाघतश्च नारे अस्मन्नि रीरमन् । आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि ॥

मा । उ । सु । त्वा । वाघतः । च । न । आरे । अस्मत् । नि । रीरमन् । आरात्तात् । वा । सधमादम् । सध । मादम् । नः । आ । गहि । इह । वा । सन् । उप । श्रुधि ॥२८४॥

Samveda - Mantra Number : 284
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे इन्द्र परमात्मन् ! (वाघतः) हमारे शरीर-यज्ञ के ऋत्विज् इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि (च न) निश्चय ही (त्वा) तुझे (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (मा उ सु) मत (निरीरमन्) रमायें अर्थात् इन्द्रिय आदियों से विषयों में आकृष्ट हुआ मैं तुझे अपने पास से दूर न रखूँ। तू (आरात्ताद् वा) दूर से भी (नः) हमारे (सधमादम्) जीवन-यज्ञ या उपासना-यज्ञ में (आ गहि) आ, (इह वा सन्) और यहीं हृदय में रहता हुआ (उपश्रुधि) हमारी स्तुति और प्रार्थना को सुन ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! (वाघतः) बुद्धिमान् राजमन्त्री, नगराधीश आदि राज्याधिकारी (च न) निश्चय ही (त्वा) तुझे (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (मा उ सु) मत (निरीरमन्) रोकें, अर्थात् तुझ राजा को हमारे लिए सुलभ करायें। हे राजन् ! (आरात्ताद् वा) सुदूरस्थ भी अपनी राजधानी से, तू (नः) हमारे (सधमादम्) यज्ञ-समारोह में (आ गहि) आ, (इह वा सन्) और यहीं हमारे मध्य में विराजमान होता हुआ तू (उपश्रुधि) हमारे सुखदुःखादि के निवेदन को सुन ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। रेफ की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
Essence
राजराजेश्वर परमात्मा और मानव राजा हम प्रजाजनों को सदा सुलभ रहता हुआ हमारे सुख-दुःख को जाने ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से प्रार्थना की गयी है।