Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 282

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣ ने꣡दी꣢य꣣ ए꣡दि꣢हि मि꣣त꣡मे꣢धाभिरू꣣ति꣡भिः꣢ । आ꣡ शं꣢तम꣣ शं꣡त꣢माभिर꣣भि꣡ष्टि꣢भि꣣रा꣡ स्वा꣢꣯पे꣢꣯ स्वा꣣पि꣡भिः꣢ ॥२८२॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । ने꣡दी꣢꣯यः । आ । इत् । इ꣣हि । मित꣡मे꣢धाभिः । मि꣣त꣢ । मे꣣धाभिः । ऊति꣡भिः꣢ । आ । श꣣न्तम । श꣡न्त꣢꣯माभिः । अ꣣भि꣡ष्टि꣢भिः । आ । स्वा꣢पे । सु । आपे । स्वापि꣡भिः꣢ । सु꣣ । आपि꣡भिः꣢ । ॥२८२॥

Mantra without Swara
इन्द्र नेदीय एदिहि मितमेधाभिरूतिभिः । आ शंतम शंतमाभिरभिष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः ॥

इन्द्र । नेदीयः । आ । इत् । इहि । मितमेधाभिः । मित । मेधाभिः । ऊतिभिः । आ । शन्तम । शन्तमाभिः । अभिष्टिभिः । आ । स्वापे । सु । आपे । स्वापिभिः । सु । आपिभिः । ॥२८२॥

Samveda - Mantra Number : 282
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) परमेश्वर, राजन् वा विद्वन् ! आप (मितमेधाभिः) मेधापूर्ण (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ (नेदीयः इत्) हमारे अधिक समीप (आ इहि) आइए। हे (शन्तम) अतिशय कल्याण करनेवाले ! आप (शन्तमाभिः) अतिशय कल्याण करनेवाली (अभिष्टिभिः) अभीष्ट प्राप्तियों के साथ (आ) आइए। हे (स्वापे) सुबन्धु ! आप (स्वापिभिः) उत्कृष्ट बन्धुभावों के साथ (आ) आइए ॥१०॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है। दकार, तकार, मकार की आवृत्ति में, ‘भि’ की आवृत्ति में और ‘रभि’, ‘भिरा’ में वृत्त्यनुप्रास है। ‘शन्तम, शन्तमा’ और ‘स्वापे, स्वापि’ में छेकानुप्रास है ॥१०॥
Essence
जैसे परमेश्वर की रक्षाएँ बुद्धिपूर्ण, दान कल्याणकारी और बन्धुभाव शुभ होते हैं, वैसे ही राष्ट्र में राजा और विद्वान् अध्यापक के भी हों ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र नाम से परमेश्वर, राजा, आचार्य आदि के गुण-कर्म-स्वभावों का वर्णन करके उनसे अभय आदि की याचना होने से, सूर्य नाम से भी इनकी स्तुति होने से और श्रद्धा आदि का भी महत्त्व वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ तृतीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र नाम से परमेश्वर, राजा, विद्वान् आदि का आह्वान किया गया है।