Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 281

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी अ꣣पा꣢दि꣣यं꣡ पूर्वागा꣢꣯त्प꣣द्व꣡ती꣢भ्यः । हि꣢त्वा꣡ शिरो꣢꣯ जि꣣ह्व꣢या꣣ रा꣡र꣢प꣣च्च꣡र꣢त्त्रि꣣ꣳश꣢त्प꣣दा꣡ न्य꣢क्रमीत् ॥२८१॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । अ꣣पा꣢त् । अ꣣ । पा꣢त् । इ꣣य꣢म् । पू꣡र्वा꣢꣯ । आ । अ꣣गात् । पद्व꣡ती꣢भ्यः । हि꣣त्वा꣢ । शि꣡रः꣢꣯ । जि꣣ह्व꣡या꣢ । रा꣡र꣢꣯पत् । च꣡र꣢꣯त् । त्रिँ꣣श꣢त् । प꣣दा꣡नि꣢ । अ꣣क्रमीत् ॥२८१॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात्पद्वतीभ्यः । हित्वा शिरो जिह्वया रारपच्चरत्त्रिꣳशत्पदा न्यक्रमीत् ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । अपात् । अ । पात् । इयम् । पूर्वा । आ । अगात् । पद्वतीभ्यः । हित्वा । शिरः । जिह्वया । रारपत् । चरत् । त्रिँशत् । पदानि । अक्रमीत् ॥२८१॥

Samveda - Mantra Number : 281
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—श्रद्धा के पक्ष में। हे (इन्द्राग्नी) परमात्मन् और जीवात्मन् ! तुम्हारे सान्निध्य से (अपात्) पैरों से रहित भी (इयम्) यह पूर्व मन्त्र में वर्णित श्रद्धा (पद्वतीभ्यः) पैरोंवाली प्रजाओं से (पूर्वा) पूर्व-गामिनी होती हुई (आ अगात्) आ गयी है। (शिरः) सिर को (हित्वा) छोड़कर भी, अर्थात् बिना सिरवाली होती हुई भी यह (जिह्वया) जिह्वा से (रारपत्) पुनः-पुनः बोलती हुई सी, अर्थात् अपना सन्देश सुनाती हुई सी (चरत्) विचर रही है और यह (त्रिंशत् पदानि) शरीरस्थ दस इन्द्रियों, दस प्राणों, पाँच कोशों और आत्मासहित अहङ्कारचतुष्टय इन तीसों स्थानों को (अक्रमीत्) व्याप्त कर रही है ॥ द्वितीय—उषा के पक्ष में। हे (इन्द्राग्नी) ब्राह्मणो और क्षत्रियो ! (अपात्) पैरों से रहित भी (इयम्) यह उषा (पद्वतीभ्यः) सोयी हुई पैरोंवाली प्रजाओं से (पूर्वा) पहले जागकर (आ अगात्) आ गयी है। यह उषा (शिरः) सिर को (हित्वा) छोड़कर भी अर्थात् बिना सिर के भी (जिह्वया) जिह्वा-सदृश अपनी प्रभा से (रारपत्) जागरण का सन्देश पुनः पुनः बोलती हुई सी (चरत्) विचर रही है। (त्रिंशत् पदानि) अहोरात्र के तीसों मूहूर्तों को (अक्रमीत्) पार करके आ गयी है, क्योंकि एक पूरे अहोरात्र के पश्चात् उषा का पुनः प्रादुर्भाव होता है ॥ तृतीय—विद्युत् के पक्ष में। हे (इन्द्राग्नी) राजप्रजाजनो ! देखो, (अपात्) पैरों से रहित भी (इयम्) यह विद्युत् (पद्वतीभ्यः) पैरोंवाली मनुष्य, पशु आदि प्रजाओं से (पूर्वा) तीव्रगामिनी होती हुई (आ अगात्) हमारे उपयोग के लिए हमें प्राप्त हुई है। यह विद्युत् (शिरः हित्वा) सिर के बिना भी (जिह्वया) सन्देशवाहक विद्युत्-तारयन्त्र द्वारा (रारपत्) पुनः-पुनः सन्देश-प्रेषक के सन्देश को बोलती हुई (चरत्) तार में चलती है। यह (त्रिंशत् पदानि) महीने के तीसों दिनों को व्याप्त करके (अक्रमीत्) प्रकाश-प्रदान, सन्देशवहन, यन्त्रचालन आदि कार्यों में पग रखती है अर्थात् इन कार्यों को करती है ॥९॥ इस मन्त्र में ‘पैर-रहित होती हुई भी पैरोंवालियों से पहले पहुँच जाती है’, ‘सिर-रहित होती हुई भी जिह्वा से बोलती है’, यहाँ बिना कारण के कार्योत्पत्ति का वर्णन होने से विभावना अलङ्कार है। श्रद्धा, उषा, विद्युत् आदि किसी का नाम लिये बिना संकेतों से सूचना देने के कारण प्रहेलिकालङ्कार भी है ॥९॥
Essence
श्रद्धा के धारण से धर्म में प्रवृत्ति और वैयक्तिक तथा सामाजिक उन्नति होती है। उषा जागरण का सन्देश देती है। विद्युत् के प्रयोग से रात में भी दिन के समान प्रकाश प्राप्त होता है और दूरभाषयन्त्र, आकाशवाणीयन्त्र, ऐक्सरेयन्त्र, भार ऊपर उठाने, अस्त्र छोड़ने आदि के विविध यन्त्र और स्थलयान, जलयान एवं विमान चलाये जाते हैं। इस प्रकार श्रद्धा, उषा और विद्युत् सब जनों के लिए अतिलाभकारी हैं, अतः उनका यथोचित उपयोग सबको करना चाहिए ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्राग्नी देवता हैं। पहेली द्वारा श्रद्धा, उषा, विद्युत् आदि का वर्णन है।