Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 265

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ वो꣢ वी꣣र꣡मन्ध꣢꣯सो꣣ म꣡दे꣢षु गाय गि꣣रा꣢ म꣣हा꣡ विचे꣢꣯तसम् । इ꣢न्द्रं꣣ ना꣢म꣣ श्रु꣡त्य꣢ꣳ शा꣣कि꣢नं꣣ व꣢चो꣣ य꣡था꣢ ॥२६५॥

अ꣣भि꣢ । वः꣣ । वीर꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡दे꣢꣯षु । गा꣣य । गिरा꣢ । म꣣हा꣢ । विचे꣢꣯तसम् । वि । चे꣣तसम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ना꣡म꣢꣯ । श्रु꣡त्य꣢꣯म् । शा꣣कि꣡न꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ ॥२६५॥

Mantra without Swara
अभि वो वीरमन्धसो मदेषु गाय गिरा महा विचेतसम् । इन्द्रं नाम श्रुत्यꣳ शाकिनं वचो यथा ॥

अभि । वः । वीरम् । अन्धसः । मदेषु । गाय । गिरा । महा । विचेतसम् । वि । चेतसम् । इन्द्रम् । नाम । श्रुत्यम् । शाकिनम् । वचः । यथा ॥२६५॥

Samveda - Mantra Number : 265
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे उद्गाताओ ! (वः) तुम (अन्धसः) श्रद्धारस की (मदेषु) तृप्तियों में (महा) महती (गिरा) वेदवाणी से (वीरम्) विक्रमशाली अथवा शत्रुओं को प्रकम्पित करनेवाले, (विचेतसम्) विशिष्ट ज्ञान से पूर्ण, (श्रुत्यम्) श्रुतियों में प्रसिद्ध, (शाकिनम्) शक्तिमान् (इन्द्रं नाम) इन्द्र नामक परमेश्वर को (अभि) अभिलक्ष्य करके (वचः यथा) जैसा विधिवचन हो, उसके अनुसार (गाय) गाओ, सामगान करो ॥३॥
Essence
काम, क्रोध आदि आन्तरिक शत्रुओं को तथा मानव-समाज में भ्रष्टाचारियों को अपनी वीरता से पराजित करनेवाले, सर्वज्ञ, वेदों में प्रसिद्ध, सब कार्य करने में समर्थ परमेश्वर की सबको सामगानपूर्वक अर्चना करनी चाहिए ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर के स्तुतिगान की प्रेरणा की गयी है।