Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 262

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्र꣣ ना꣡हु꣢षी꣣ष्वा꣡ ओजो꣢꣯ नृ꣣म्णं꣡ च꣢ कृ꣣ष्टि꣡षु꣢ । य꣢द्वा꣣ प꣡ञ्च꣢ क्षिती꣣नां꣢ द्यु꣣म्न꣡मा भ꣢꣯र स꣣त्रा꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ पौ꣡ꣳस्या꣢ ॥२६२॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । ना꣡हु꣢꣯षीषु । आ । ओ꣡जः꣢꣯ । नृ꣣म्ण꣢म्꣢ । च꣣ । कृष्टि꣡षु꣢ । यत् । वा꣣ । प꣡ञ्च꣢꣯ । क्षि꣣तीना꣢म् । द्यु꣣म्नम् । आ । भ꣣र । सत्रा꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । पौँ꣡स्या꣢꣯ ॥२६२॥

Mantra without Swara
यदिन्द्र नाहुषीष्वा ओजो नृम्णं च कृष्टिषु । यद्वा पञ्च क्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौꣳस्या ॥

यत् । इन्द्र । नाहुषीषु । आ । ओजः । नृम्णम् । च । कृष्टिषु । यत् । वा । पञ्च । क्षितीनाम् । द्युम्नम् । आ । भर । सत्रा । विश्वानि । पौँस्या ॥२६२॥

Samveda - Mantra Number : 262
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) दान के महारथी परमेश्वर ! (यत्) जो (नाहुषीषु) संघरूप में परस्पर बँधी हुई मानव-प्रजाओं में (ओजः) संघ का बल, और (कृष्टिषु) कृषि आदि धन कमाने के कामों में लगी हुई प्रजाओं में (नृम्णम्) धन का बल (आ) आता है, (यद् वा) और जो (पञ्चक्षितीनाम्) निवास में कारणभूत पाँच ज्ञानेन्द्रियों का अथवा प्राण, मन, बुद्धि चित्त, अहङ्कार इन पाँचों का (द्युम्नम्) यश है, वह (आभर) हमें प्रदान कीजिए। (सत्रा) साथ ही (विश्वानि) सब (पौंस्या) धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पुरुषार्थों को भी (आभर) प्रदान कीजिए ॥१०॥
Essence
संघ का बल, ऐश्वर्य का बल, इन्द्रियों का बल, प्राणसहित अन्तःकरणचतुष्टय का बल, और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का बल परमेश्वर की कृपा से हमें प्राप्त हो, जिससे हमारा मनुष्य-जीवन सफल हो ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र तथा उससे सम्बद्ध मित्र, वरुण, अर्यमा के महत्त्ववर्णनपूर्वक उसकी स्तुति के लिए प्रेरणा होने से, इन्द्र से ओज, क्रतु, नृम्ण, द्युम्न आदि की याचना होने से और इन्द्र नाम से आचार्य, राजा, सेनाध्यक्ष आदि के भी गुण-कर्मों का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ तृतीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि किन-किन का क्या-क्या गुण हमें प्राप्त करना चाहिए।