Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 257

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य बृह꣣ते꣡ मरु꣢꣯तो꣣ ब्र꣡ह्मा꣢र्चत । वृ꣣त्र꣡ꣳ ह꣢नति वृत्र꣣हा꣢ श꣣त꣡क्र꣢तु꣣र्वज्रेण श꣣त꣡प꣢र्वणा ॥२५७॥

प्र꣢ । वः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । बृ꣣हते꣢ । म꣡रु꣢꣯तः । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । अ꣣र्चत । वृत्र꣢म् । ह꣢नति । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । श꣣त꣡क्र꣢तुः । श꣣त꣢ । क्र꣣तुः । व꣡ज्रे꣢꣯ण । श꣣त꣡प꣢र्वणा । श꣣त꣢ । प꣣र्वणा ॥२५७॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत । वृत्रꣳ हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा ॥

प्र । वः । इन्द्राय । बृहते । मरुतः । ब्रह्म । अर्चत । वृत्रम् । हनति । वृत्रहा । वृत्र । हा । शतक्रतुः । शत । क्रतुः । वज्रेण । शतपर्वणा । शत । पर्वणा ॥२५७॥

Samveda - Mantra Number : 257
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (मरुतः) मेरे प्राणो ! (वः) तुम (बृहते) महान् (इन्द्राय) परमेश्वर के लिए (ब्रह्म) साम-स्तोत्र को (प्र अर्चत) प्रेरित करो। वह (वृत्रहा) पापहन्ता (शतक्रतुः) अनन्त प्रज्ञावाला तथा अनन्त कर्मोंवाला परमेश्वर, अपने (शतपर्वणा) बहुमुखी (वज्रेण) वीर्य से (वृत्रम्) पाप को (हनति) नष्ट करे ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (मरुतः) राष्ट्रवासी प्रजाजनो ! (वः) तुम लोग (बृहते) महान् (इन्द्राय) वीर सेनाध्यक्ष के लिए (ब्रह्म) स्तोत्र अर्थात् प्रार्थनावचन (अर्चत) प्रेरित करो। वह (वृत्रहा) अत्याचारियों का संहारक (शतक्रतुः) अनेक शत्रु-विध्वंसक कार्यों का कर्ता सेनाध्यक्ष (शतपर्वणा वज्रेण) सौ कीलों से युक्त गदादि वज्र से अथवा सौ गोलों या गोलियों के आधारभूत तोप, बन्दूक आदि शस्त्र से (वृत्रम्) राष्ट्र की उन्नति में प्रतिबन्धक मायावी शत्रु को (हनति) मारे ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, ‘वृत्रं, वृत्र’ में छेकानुप्रास और ‘शत, शत’ में लाटानुप्रास है ॥५॥
Essence
जैसे परमेश्वर उपासक के काम-क्रोध आदि तथा पाप आदि रिपुओं का संहार करता है, वैसे ही सेनाध्यक्ष को चाहिए कि राष्ट्र के सब शत्रुओं का समूल उन्मूलन करे ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में यह विषय है कि परमात्मा और सेनाध्यक्ष हमारे शत्रुओं का संहार करें।