Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 230

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣यं꣡ घा꣢ ते꣣ अ꣡पि꣢ स्मसि स्तो꣣ता꣡र꣢ इन्द्र गिर्वणः । त्वं꣡ नो꣢ जिन्व सोमपाः ॥२३०॥

व꣣य꣢म् । घ꣣ । ते । अ꣡पि꣢꣯ । स्म꣣सि । स्तोता꣡रः꣢ । इ꣣न्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । त्व꣢म् । नः꣣ । जिन्व । सोमपाः । सोम । पाः ॥२३०॥

Mantra without Swara
वयं घा ते अपि स्मसि स्तोतार इन्द्र गिर्वणः । त्वं नो जिन्व सोमपाः ॥

वयम् । घ । ते । अपि । स्मसि । स्तोतारः । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । त्वम् । नः । जिन्व । सोमपाः । सोम । पाः ॥२३०॥

Samveda - Mantra Number : 230
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (गिर्वणः) वेदवाणियों से भजनीय ! (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (वयम्) हम (स्तोतारः) स्तोता लोग (घ) निश्चय ही (ते अपि) तेरे ही (स्मसि) हैं। हे (सोमपाः) हमारे मैत्री-रस का पान करनेवाले ! (त्वम्) तू (नः) हमें (जिन्व) तृप्त कर ॥८॥
Essence
जो लोग परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़ते हैं, परमात्मा भी उन्हें सदा सुखी करता है ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के स्तुति-विषय का वर्णन है।