Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 229

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ब्रा꣡ह्म꣢णादिन्द्र꣣ रा꣡ध꣢सः꣣ पि꣢बा꣣ सो꣡म꣢मृ꣣तू꣡ꣳरनु꣢꣯ । त꣢वे꣣द꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मस्तृ꣢꣯तम् ॥२२९॥

ब्रा꣡ह्म꣢꣯णात् । इ꣣न्द्र । रा꣡ध꣢꣯सः । पि꣡ब꣢꣯ । सो꣡म꣢꣯म् । ऋ꣣तू꣢न् । अ꣡नु꣢꣯ । त꣡व꣢꣯ । इ꣣द꣢म् । स꣣ख्य꣢म् । स꣣ । ख्य꣢म् । अ꣡स्तृ꣢꣯तम् । अ । स्तृ꣣तम् ॥२२९॥

Mantra without Swara
ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिबा सोममृतूꣳरनु । तवेदꣳ सख्यमस्तृतम् ॥

ब्राह्मणात् । इन्द्र । राधसः । पिब । सोमम् । ऋतून् । अनु । तव । इदम् । सख्यम् । स । ख्यम् । अस्तृतम् । अ । स्तृतम् ॥२२९॥

Samveda - Mantra Number : 229
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! आप (राधसः) ध्यान-यज्ञ के साधक (ब्राह्मणात्) वेद तथा ईश्वर के ज्ञाता मुझसे (ऋतून् अनु) ऋतुओं के अनुरूप, समयानुसार (सोमम्) मेरे मैत्री-रस का (पिब) पान कीजिए। मेरे साथ (तव) आपकी (इदम्) यह (सख्यम्) मित्रता (अस्तृतम्) अविनष्ट अर्थात् चिरस्थायी रहे ॥ द्वितीय—गुरुशिष्य के पक्ष में। हे (इन्द्र) विद्युत् के समान तीव्र बुद्धिवाले विद्यार्थी ! तू (राधसः) अध्ययन-अध्यापन यज्ञ के साधक (ब्राह्मणात्) ब्रह्मवेत्ता, वेदवेत्ता और ब्राह्मण स्वभाववाले आचार्य से (ऋतून् अनु) प्रत्येक ऋतु में (सोमम्) मेरे ज्ञान-रस को (पिब) पी। (तव) तेरी (इदम्) यह गुरुशिष्य-सम्बन्ध-रूप (सख्यम्) मित्रता (अस्तृतम्) अविनष्ट रहे ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
Essence
जो परमात्मा और गुरु की मैत्री को प्राप्त करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य की मित्रता की याचना की गयी है।