Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 224

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣢दु꣣ प्र꣡चे꣢तसे म꣣हे꣡ वचो꣢꣯ दे꣣वा꣡य꣢ शस्यते । त꣡दिध्य꣢꣯स्य꣣ व꣡र्ध꣢नम् ॥२२४

क꣢त् । उ꣣ । प्र꣡चे꣢꣯तसे । प्र । चे꣣तसे । महे꣢ । व꣡चः꣢꣯ । दे꣣वा꣡य꣢ । श꣣स्यते । त꣢त् । इत् । हि । अ꣣स्य । व꣡र्ध꣢꣯नम् ॥२२४॥

Mantra without Swara
कदु प्रचेतसे महे वचो देवाय शस्यते । तदिध्यस्य वर्धनम् ॥२२४

कत् । उ । प्रचेतसे । प्र । चेतसे । महे । वचः । देवाय । शस्यते । तत् । इत् । हि । अस्य । वर्धनम् ॥२२४॥

Samveda - Mantra Number : 224
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(कत् उ) किसलिए (प्रचेतसे) प्रकृष्ट ज्ञान वा प्रकृष्ट चित्तवाले, (महे) महान् (देवाय) दिव्य गुण-कर्म-स्वभाववाले इन्द्र परमेश्वर के लिए (वचः) स्तुति-वचन (शस्यते) उच्चारण किया जाता है? यह प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर है—(हि) क्योंकि (तत्) वह स्तुति-वचन (अस्य) इस स्तुतिकर्ता यजमान का (वर्धनम्) बढ़ानेवाला होता है ॥२॥
Essence
परमेश्वर के लिए जो स्तुति-वचन कहे जाते हैं, उनसे स्तोता की ही वृद्धि और उन्नति होती है, यह जानना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताया गया है कि परमात्मा की स्तुति हम क्यों करें।