Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 218

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ऋ꣣जुनीती꣢ नो꣣ व꣡रु꣢णो मि꣣त्रो꣡ न꣢यति वि꣣द्वा꣢न् । अ꣣र्यमा꣢ दे꣣वैः꣢ स꣣जो꣡षाः꣢ ॥२१८॥

ऋ꣣जुनी꣢ती । ऋ꣣जु । नीती꣢ । नः꣣ । व꣡रु꣢꣯णः । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । न꣣यति । विद्वा꣢न् । अ꣣र्यमा꣢ । दे꣣वैः꣢ । स꣣जो꣡षाः । स꣣ । जो꣡षाः꣢꣯ ॥२१८॥

Mantra without Swara
ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयति विद्वान् । अर्यमा देवैः सजोषाः ॥

ऋजुनीती । ऋजु । नीती । नः । वरुणः । मित्रः । मि । त्रः । नयति । विद्वान् । अर्यमा । देवैः । सजोषाः । स । जोषाः ॥२१८॥

Samveda - Mantra Number : 218
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—अध्यात्म के पक्ष में। हे इन्द्र परमात्मन् ! आपकी सहायता से (देवैः) चक्षु आदि इन्द्रियों के साथ (सजोषाः) प्रीतिवाला, (विद्वान्) ज्ञानी (वरुणः) पापों से निवारण करनेवाला जीवात्मा, (मित्रः) प्राण, और (अर्यमा) मन (नः) हमें (ऋजुनीती) सरल धर्ममार्ग से (नयति) ले चलें ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! (देवैः) अपने-अपने अधिकार में व्यवहार करनेवाले राजपुरुषों के साथ (सजोषाः) प्रीतिवाला अर्थात् अनुकूलता रखनेवाला (विद्वान्) विद्वान् विद्यासभाध्यक्ष, (वरुणः) शत्रुनिवारक, शस्त्रास्त्रधारी सेनाध्यक्ष, (मित्रः) कुत्सित आचरणरूप मृत्यु से त्राण करनेवाला धर्म-सभा का अध्यक्ष और (अर्यमा) न्यायसभा का अध्यक्ष (नः) हम प्रजाजनों को (ऋजुनीती) सरल धर्ममार्ग से (नयति) ले चलें ॥ तृतीय—विद्वान् के पक्ष में। (देवैः) विद्या और व्रत-शिक्षा का दान करनेवाले सब अध्यापकों से (सजोषाः) सामञ्जस्य रखता हुआ (वरुणः) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाला, छात्रों द्वारा आचार्यरूप में वरण किया गया व छात्रों को शिष्यरूप से वरनेवाला, (मित्रः) पापरूप मरण से त्राण करानेवाला, (अर्यमा) न्यायकारी (विद्वान्) विद्वान् आचार्य (नः) हम शिष्यों को (ऋजुनीती) सरल विद्या-दान और व्रत-पालन करने की नीति से (नयति) आगे ले चले, अर्थात् हमें सुयोग्य विद्या-व्रत-स्नातक बनाये ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
Essence
शरीर में विद्यमान जीवात्मा, प्राण, मन आदि देव परमात्मा के पास से बल प्राप्त कर मनुष्यों को धर्म-मार्ग से ले जाते हैं। उसी प्रकार राष्ट्र में विद्यासभा, धर्मसभा और न्यायसभा के अध्यक्ष तथा सेना का अध्यक्षप्रजाजनों को धर्ममार्ग में ले चलें । गुरुकुलवासी सुयोग्य अध्यापकों से युक्त, श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाला आचार्य भी शिष्यों को धर्म तथा विद्या के मार्ग में ले चले ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में यह प्रार्थना है कि इन्द्र से अधिष्ठित वरुण, मित्र आदि हमें सरल मार्ग से ले चलें।