Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1870

1875 Mantra
Devata- संग्रामशिषः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म꣡र्मा꣢णि ते꣣ व꣡र्म꣢णा च्छादयामि꣣ सो꣡म꣢स्त्वा꣣ रा꣢जा꣣मृ꣢ते꣣ना꣡नु꣢ वस्ताम् । उ꣣रो꣡र्वरी꣢꣯यो꣣ व꣡रु꣢णस्ते कृणोतु꣣ ज꣡य꣢न्तं꣣ त्वा꣡नु꣢ दे꣣वा꣡ म꣢दन्तु ॥१८७०॥

म꣡र्मा꣢꣯णि । ते꣣ । व꣡र्म꣢꣯णा । छा꣣दयामि । सो꣡मः꣢꣯ । त्वा । रा꣡जा꣢꣯ । अ꣣मृ꣡ते꣢न । अ꣣ । मृ꣡ते꣢꣯न । अ꣡नु꣢꣯ । व꣣स्ताम् । उ꣣रोः꣢ । व꣡री꣢꣯यः । व꣡रु꣢꣯णः । ते꣣ । कृणोतु । ज꣡य꣢꣯न्तम् । त्वा꣣ । अ꣡नु꣢꣯ । दे꣣वाः꣢ । म꣣दन्तु ॥१८७०॥

Mantra without Swara
मर्माणि ते वर्मणा च्छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम् । उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु ॥

मर्माणि । ते । वर्मणा । छादयामि । सोमः । त्वा । राजा । अमृतेन । अ । मृतेन । अनु । वस्ताम् । उरोः । वरीयः । वरुणः । ते । कृणोतु । जयन्तम् । त्वा । अनु । देवाः । मदन्तु ॥१८७०॥

Samveda - Mantra Number : 1870
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे अध्यात्म पथ के पथिक जीवात्मन् ! (ते) तेरे (मर्माणि) मन, बुद्धि, चक्षु आदि मर्म-स्थलों को (वर्मणा) ब्रह्म-रूप कवच से (छादयामि) ढकता हूँ। (राजा) विश्व का सम्राट् (सोमः) जगदीश्वर (त्वा) तुझे (अमृतेन) आनन्द-रस से (अनुवस्ताम्) आच्छादित करे। (वरुणः) दोषनिवारक, वरणीय, विद्वान् आचार्य (ते) तेरे लिए (उरोः) विस्तृत अध्यात्म ज्ञान के (वरीयः) अतिशय उत्कृष्ट तत्त्व को (कृणोतु) प्रदान करे। (जयन्तं त्वा) अध्यात्म-क्षेत्र में और बाह्य-क्षेत्र में विजयलाभ करते हुए तेरे (अनु) पीछे-पीछे (देवाः) मन, प्राण आदि भी (मदन्तु) लहलहायें ॥१॥
Essence
योगमार्ग में पैर रखता हुआ मनुष्य ब्रह्मकवच से रक्षित होकर, गुरुजनों का मार्गनिर्देश पाकर, ब्रह्मानन्द का अनुभव करता हुआ मन, बुद्धि, प्राण आदियों के साथ अतिशय विजयी होता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में विजयाभिलाषी को आशीर्वाद दिया जा रहा है।