Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1867

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शासो भारद्वाजः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि꣢꣯ रक्षो꣣ वि꣡ मृधो꣢꣯ जहि꣣ वि꣢ वृ꣣त्र꣢स्य꣣ ह꣡नू꣢ रुज । वि꣣ म꣣न्यु꣡मि꣢न्द्र वृत्रहन्न꣣मि꣡त्र꣢स्याभि꣣दा꣡स꣢तः ॥१८६७॥

वि꣢ । र꣡क्षः꣢꣯ । वि । मृ꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि । वि꣢ । वृ꣣त्र꣡स्य꣢ । ह꣢꣯नूइ꣡ति꣢ । रु꣣ज । वि꣢ । म꣣न्यु꣢म् । इन्द्र । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अमि꣡त्र꣢स्य । अ꣣ । मि꣡त्र꣢꣯स्य । अ꣡भिदा꣡स꣢तः । अ꣣भि । दा꣡स꣢꣯तः ॥१८६७॥

Mantra without Swara
वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज । वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः ॥

वि । रक्षः । वि । मृधः । जहि । वि । वृत्रस्य । हनूइति । रुज । वि । मन्युम् । इन्द्र । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अमित्रस्य । अ । मित्रस्य । अभिदासतः । अभि । दासतः ॥१८६७॥

Samveda - Mantra Number : 1867
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (वृत्रहन् इन्द्र) पापहन्ता जीवात्मन् और शत्रुहन्ता सेनापति !तुम (रक्षः) राक्षसी स्वभाव को वा राक्षसी स्वभाववाले दुर्जन को (विजहि) विनष्ट करो, (मृधः) सङ्ग्रामकारी काम-क्रोध आदियों को वा हिंसक मानवी शत्रुओं को (विजहि) विनष्ट करो, (वृत्रस्य) पुण्य पर पर्दा डालनेवाले पाप वा पापी के (हनू) आक्रमण और बचाव के उपायों को वा जबड़ों को (विरुज) चूर-चूर कर दो। (अभिदासतः) दंशन-छेदन-भेदन करनेवाले (अमित्रस्य) शत्रु के (मन्युम्) प्रदीप्त-प्रभाव को वा क्रोध को (वि) विध्वस्त कर दो ॥१॥
Essence
जैसे राष्ट्र में सेनापति संहारकारी शत्रुओं का मर्दन करता है, वैसे ही शरीर में जीवात्मा राक्षसी स्वभाव को, हिंसक काम-क्रोध आदियों को, धर्म पर पर्दा डालनेवाले पाप को और बिच्छू के समान काटनेवाली कुटिलता को विध्वस्त करे ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जीवात्मा और सेनापति को उद्बोधन देते हैं।