Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1862

1875 Mantra
Devata- इन्द्रो मरुतो वा Rishi- अप्रतिरथ ऐन्द्रः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रे꣢ता꣣ ज꣡य꣢ता नर꣣ इ꣡न्द्रो꣢ वः꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु । उ꣣ग्रा꣡ वः꣢ सन्तु बा꣣ह꣡वो꣢ऽनाधृ꣣ष्या꣡ यथास꣢꣯थ ॥१८६२॥

प्र꣢ । इ꣣त । ज꣡य꣢꣯त । न꣣रः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वः꣣ । श꣡र्म꣢꣯ । य꣣च्छतु । उग्राः꣢ । वः꣣ । सन्तु । बाह꣡वः꣢ । अ꣣नाधृष्याः꣢ । अ꣣न् । आधृष्याः꣢ । य꣡था꣢꣯ । अ꣡स꣢꣯थ ॥१८६२॥

Mantra without Swara
प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु । उग्रा वः सन्तु बाहवोऽनाधृष्या यथासथ ॥

प्र । इत । जयत । नरः । इन्द्रः । वः । शर्म । यच्छतु । उग्राः । वः । सन्तु । बाहवः । अनाधृष्याः । अन् । आधृष्याः । यथा । असथ ॥१८६२॥

Samveda - Mantra Number : 1862
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (नरः) वीर-पुङ्गव योद्धाओ ! (प्रेत) आगे बढ़ो, (जयत) विजय पाओ। (इन्द्रः) तुम्हारा वीर अन्तरात्मा (वः) तुम्हें (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे। (वः) तुम्हारी (बाहवः) भुजाएँ (उग्राः) उग्र (सन्तु) हों, (यथा) जिससे, तुम (अनाधृष्याः) अपराजेय (असथ) हो जाओ ॥२॥ इस मन्त्र में वीर रस है ॥२॥
Essence
मनुष्यों को उद्बोधन तभी मिल सकता है यदि उनका आत्मा बलवान् हो। इसलिए अपने आत्मा को बली बनाकर, उद्बोधन पाकर जीवन-सङ्ग्राम में सबको विजय प्राप्त करनी चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में वीरों को उद्बोधन दिया गया है।