Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1845

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सुपर्णः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣣य꣢ꣳ स꣣ह꣢स्रा꣣ प꣡रि꣢ यु꣣क्ता꣡ वसा꣢꣯नः꣣ सू꣡र्य꣢स्य भा꣣नुं꣢ य꣣ज्ञो꣡ दा꣢धार । स꣣हस्रदाः꣡ श꣢त꣣दा꣡ भू꣢रि꣣दा꣡वा꣢ ध꣣र्त्ता꣢ दि꣣वो꣡ भुवन꣢꣯स्य वि꣣श्प꣡तिः꣢ ॥१८४५

अ꣢य꣣म् । स꣣ह꣡स्रा꣢ । प꣡रि꣢꣯ । यु꣣क्ता꣡ । व꣡सा꣢꣯नः । सू꣡र्य꣢꣯स्य । भा꣣नु꣢म् । य꣣ज्ञः꣢ । दा꣣धार । सहस्रदाः꣢ । स꣣हस्र । दाः꣢ । श꣢तदाः꣢ । श꣣त । दाः꣢ । भू꣣रिदा꣡वा꣢ । भू꣣रि । दा꣡वा꣢꣯ । ध꣣र्ता꣢ । दि꣣वः꣢ । भु꣡व꣢꣯नस्य । वि꣣श्प꣡तिः꣢ ॥१८४५॥

Mantra without Swara
अयꣳ सहस्रा परि युक्ता वसानः सूर्यस्य भानुं यज्ञो दाधार । सहस्रदाः शतदा भूरिदावा धर्त्ता दिवो भुवनस्य विश्पतिः ॥१८४५

अयम् । सहस्रा । परि । युक्ता । वसानः । सूर्यस्य । भानुम् । यज्ञः । दाधार । सहस्रदाः । सहस्र । दाः । शतदाः । शत । दाः । भूरिदावा । भूरि । दावा । धर्ता । दिवः । भुवनस्य । विश्पतिः ॥१८४५॥

Samveda - Mantra Number : 1845
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यज्ञः) पूजनीय यह अग्नि नामक जगदीश्वर (युक्ताः) आकर्षण के बल से आपस में जुड़े हुए (सहस्रा) सहस्रों नक्षत्रों को (वसानः) बसाता हुआ (सूर्यस्य) सूर्य के (भानुम्) तेज को (दाधार) धारण कर रहा है। यह जगदीश्वर (सहस्रदाः) सहस्र वस्तुओं का दाता, (शतदा) सौ रत्नों का दाता, (भूरिदावा) बहुत-बहुत दूध-दही-मक्खन आदि का और विद्या-धर्म आदि का दाता, (दिवः धर्ता) द्युलोक का धारणकर्ता और (भुवनस्य) ब्रह्माण्ड का (विश्पतिः) प्रजापति है ॥३॥
Essence
जगदीश्वर ही हमारे सौरमण्डल को, असंख्य तारों को, सारे ही ब्रह्माण्ड को धारण करता हुआ हमें सब सम्पदाएँ देता है ॥३॥
Subject
आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।