Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1842

1875 Mantra
Devata- वायुः Rishi- उलो वातायनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢द꣣दो꣡ वा꣢त ते गृ꣣हे꣢३꣱ऽमृ꣢तं꣣ नि꣡हि꣢तं꣣ गु꣡हा꣢ । त꣡स्य꣢ नो देहि जी꣣व꣡से꣢ ॥१८४२॥

य꣢त् । अ꣣दः꣢ । वा꣣त । ते । गृहे꣢ । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । नि꣡हि꣢꣯तम् । नि । हि꣣तम् । गु꣡हा꣢꣯ । त꣡स्य꣢꣯ । नः꣣ । धेहि । जीव꣡से꣢ ॥१८४२॥

Mantra without Swara
यददो वात ते गृहे३ऽमृतं निहितं गुहा । तस्य नो देहि जीवसे ॥

यत् । अदः । वात । ते । गृहे । अमृतम् । अ । मृतम् । निहितम् । नि । हितम् । गुहा । तस्य । नः । धेहि । जीवसे ॥१८४२॥

Samveda - Mantra Number : 1842
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (वात) जीवात्मा-सहित प्राण ! (यत् ते गृहे) जो तुम्हारे शरीर रूप घर में (गुहा) हृदय-गुहा के अन्दर (अदः) यह (अमृतम्) अक्षय परमात्मा-रूप ज्योति (निहितम्) रखी हुई है, (जीवसे) जीवन के लिए (तस्य नः धेहि) उसकी हमें प्राप्ति कराओ ॥३॥
Essence
प्राणायाम द्वारा प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाने पर, मन में धारणाओं की योग्यता उत्पन्न हो जाने पर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हृदय में निहित परमात्म-ज्योति प्रकाशित हो जाती है ॥३॥
Subject
आगे पुनः उसी विषय का कथन है।