Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1839

1875 Mantra
Devata- आपः Rishi- त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीप आम्बरीषो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣢स्मा꣣ अ꣡रं꣢ गमाम वो꣣ य꣢स्य꣣ क्ष꣡या꣢य꣣ जि꣡न्व꣢थ । आ꣡पो꣢ ज꣣न꣡य꣢था च नः ॥१८३९॥

त꣡स्मै꣢꣯ । अ꣡र꣢꣯म् । ग꣣माम । वः । य꣡स्य꣢꣯ । क्ष꣡या꣢꣯य । जि꣡न्व꣢꣯थ । आ꣡पः꣢꣯ । ज꣣न꣡य꣢थ । च꣣ । नः ॥१८३९॥

Mantra without Swara
तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः ॥

तस्मै । अरम् । गमाम । वः । यस्य । क्षयाय । जिन्वथ । आपः । जनयथ । च । नः ॥१८३९॥

Samveda - Mantra Number : 1839
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (आपः) ब्रह्मानन्द की धाराओ ! (तस्मै) उस प्रयोजन के लिए, हम (वः) तुम्हें (अरम्) पर्याप्त रूप से (गमाम) प्राप्त कर लें, (यस्य) जिस अभ्युदय और निःश्रेयस रूप प्रयोजन के (क्षयाय) हमारे अन्दर निवास कराने के लिए, तुम (जिन्वथ) गति करती हो। तुम (नः) हमें (जनयथ च) नवजीवन से अनुप्राणित भी कर दो ॥३॥
Essence
परमात्मा की उपासना से जो दिव्य आनन्द प्राप्त होता है,उससे मनुष्य अपने जीवन में परम उत्कर्ष और मोक्ष भी पा सकता है ॥३॥
Subject
आगे फिर ब्रह्मानन्द की धाराओं का ही विषय है।