Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1838

1875 Mantra
Devata- आपः Rishi- त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीप आम्बरीषो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो꣡ वः꣢ शि꣣व꣡त꣢मो꣣ र꣢स꣣स्त꣡स्य꣢ भाजयते꣣ह꣡ नः꣢ । उ꣣शती꣡रि꣢व मा꣣त꣡रः꣢ ॥१८३८॥

यः । वः꣣ । शिव꣡त꣢मः । र꣡सः꣢꣯ । त꣡स्य꣢꣯ । भा꣣जयत । इह꣡ । नः꣣ । उशतीः꣢ । इ꣣व । मात꣡रः꣢ ॥१८३८॥

Mantra without Swara
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः ॥

यः । वः । शिवतमः । रसः । तस्य । भाजयत । इह । नः । उशतीः । इव । मातरः ॥१८३८॥

Samveda - Mantra Number : 1838
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे ब्रह्मानन्द की धाराओ ! (यः) जो (वः) तुम्हारा (शिवतमः) अतिशय शान्तिदायक (रसः) रस है, (तस्य) उसका (इह) इस जीवन में (नः) हमें (भाजयत) भागी बनाओ, पान कराओ, (उशतीः) सन्तान से प्रेम करती हुई (मातरः इव) माताएँ जैसे अपने स्तनों का दूध अपनी सन्तान को पिलाती हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
माता के स्तन के दूध में जो माधुर्य है, वही ब्रह्म के पास से प्राप्त आनन्द-धाराओं में है, ऐसा विद्वान् उपासक लोग अनुभव करते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में ब्रह्मानन्द की धाराओं के रस की प्रार्थना है।