Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1836

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
धे꣣नु꣡ष्ट꣢ इन्द्र सू꣣नृ꣢ता꣣ य꣡ज꣢मानाय सुन्व꣣ते꣢ । गा꣡मश्वं꣢꣯ पि꣣प्यु꣡षी꣢ दुहे ॥१८३६॥

धे꣣नुः꣢ । ते꣣ । इन्द्र । सूनृ꣡ता꣢ । सु꣣ । नृ꣡ता꣢꣯ । य꣡ज꣢꣯मानाय । सु꣣न्वते꣢ । गाम् । अ꣡श्व꣢꣯म् । पि꣣प्यु꣡षी꣢ । दु꣣हे ॥१८३६॥

Mantra without Swara
धेनुष्ट इन्द्र सूनृता यजमानाय सुन्वते । गामश्वं पिप्युषी दुहे ॥

धेनुः । ते । इन्द्र । सूनृता । सु । नृता । यजमानाय । सुन्वते । गाम् । अश्वम् । पिप्युषी । दुहे ॥१८३६॥

Samveda - Mantra Number : 1836
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! ते आपकी (सूनृता) सत्य और मधुर, (धेनुः) तृप्ति देनेवाली वेदवाणी (सुन्वते) भक्ति-रस प्रवाहित करनेवाले (यजमानाय) उपासक के लिए (पिप्युषी) बढ़ानेवाली होती हुई (गाम्) अन्तःप्रकाश को और (अश्वम्) प्राण-बल को (दुहे) दुहती है ॥३॥
Essence
वेद पढ़ने से मनुष्यों को परमेश्वरोपासना में प्रवृति होती है और उससे अन्तःप्रकाश, प्राणबल और पुरुषार्थ के लिए प्रेरणा मिलती है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में वेदवाणी-रूप धेनु का विषय है।