Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1808

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नीपातिथिः काण्वः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣢त्रा꣣ वि꣢ ने꣣मि꣡रे꣢षा꣣मु꣢रां꣣ न꣡ धू꣢नुते꣣ वृ꣡कः꣢ । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥१८०८॥

अ꣡त्र꣢꣯ । वि । ने꣣मिः꣢ । ए꣣षाम् । उ꣡रा꣢꣯म् । न । धू꣡नुते । वृ꣡कः꣢꣯ । दि꣡वः꣢꣯ । अ꣣मु꣡ष्य꣢ । शा꣡स꣢꣯तः । दि꣡व꣢꣯म् । य꣣य꣢ । दि꣣वावसो । दिवा । वसो ॥१८०८॥

Mantra without Swara
अत्रा वि नेमिरेषामुरां न धूनुते वृकः । दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो ॥

अत्र । वि । नेमिः । एषाम् । उराम् । न । धूनुते । वृकः । दिवः । अमुष्य । शासतः । दिवम् । यय । दिवावसो । दिवा । वसो ॥१८०८॥

Samveda - Mantra Number : 1808
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(वृकः) सूर्य (उरां न) जैसे अन्धकार से ढकनेवाली रात्रि को (वि धूनुते) विकम्पित करता है, वैसे ही (अत्र) इस देह-पुरी में (एषाम्) इन मरुतों अर्थात् प्राणों का (नेमिः) नेता जीवात्मा (उराम्) आच्छन्न करनेवाली अविद्या-रूपिणी रात्रि को (वि धूनुते) विकम्पित करता है। उस (दिवः) देह-पुरी के (शासतः) शासक (अमुष्य) इस जीवात्मा की (दिवम्) तेजोमयी देह-पुरी में, हे (दिवावसो) दीप्तिधन परमात्मन् ! आप (यय) आओ ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। दिवो, दिवं, दिवा में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
Essence
सूर्य के समान तेजस्वी जीवात्मा जहाँ स्थित होता हुआ अज्ञान, पाप आदि की रात्रि का विदारण करता है, वह देह-पुरी निश्चय ही प्रशंसायोग्य और परमात्मा के निवासयोग्य है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में उपासक फिर परमेश्वर को निमन्त्रण दे रहा है।