Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1806

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा꣡ न꣢ इन्द्र पीय꣣त्न꣢वे꣣ मा꣡ शर्ध꣢꣯ते꣣ प꣡रा꣢ दाः । शि꣡क्षा꣢ शचीवः꣣ श꣡ची꣢भिः ॥१८०६॥

मा꣢ । नः꣣ । इन्द्र । पीयत्न꣡वे꣢ । मा । श꣡र्ध꣢꣯ते । प꣡रा꣢꣯ । दाः꣣ । शि꣡क्ष꣢꣯ । श꣣चीवः । श꣡ची꣢꣯भिः ॥१८०६॥

Mantra without Swara
मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः । शिक्षा शचीवः शचीभिः ॥

मा । नः । इन्द्र । पीयत्नवे । मा । शर्धते । परा । दाः । शिक्ष । शचीवः । शचीभिः ॥१८०६॥

Samveda - Mantra Number : 1806
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! आप (नः) हमें (मा) न तो (पीयत्नवे) हिंसक काम, क्रोध, लोभ आदि के लिए और (मा) न ही (शर्धते) बलवान् किसी मानव शत्रु के लिए (परा दाः) छोड़ो। हे (शचीवः) शक्तिशाली परमात्मन् ! आप (शचीभिः) अपनी शक्तियों से (शिक्ष) हमें शक्तिशाली बनाने की इच्छा करो ॥३॥ यहाँ शकार की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है। ‘शची’ के दो बार पाठ में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥३॥
Essence
जो परमात्मा में श्रद्धावान् होते हैं, उनकी न हिंसक हिंसा कर पाते हैं, न हरानेवाले शत्रु उन्हें हरा पाते हैं। परमात्मा की प्रेरणा से शक्तिमान् मेधावी और कर्मयोगी होते हुए वे सभी विपदाओं का हनन कर देते हैं ॥३॥
Subject
अब जगदीश्वर से प्रार्थना करते हैं।