Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1805

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣क्थं꣢ च꣣ न꣢ श꣣स्य꣡मा꣢नं꣣ ना꣡गो꣢ र꣣यि꣡रा चि꣢꣯केत । न꣡ गा꣢य꣣त्रं꣢ गी꣣य꣡मा꣢नम् ॥१८०५॥

उ꣣क्थ꣢म् । च꣣ । न꣢ । श꣣स्य꣢मा꣢नम् । न । अ꣡गोः꣢꣯ । अ । गोः꣣ । रयिः꣢ । आ । चि꣣केत । न꣢ । गा꣣य꣢त्रम् । गी꣣य꣡मा꣢नम् ॥१८०५॥

Mantra without Swara
उक्थं च न शस्यमानं नागो रयिरा चिकेत । न गायत्रं गीयमानम् ॥

उक्थम् । च । न । शस्यमानम् । न । अगोः । अ । गोः । रयिः । आ । चिकेत । न । गायत्रम् । गीयमानम् ॥१८०५॥

Samveda - Mantra Number : 1805
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अगोः) सर्वव्यापक इन्द्र जगदीश्वर में श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य का (न) न तो (शस्यमानम्) बोला जाता हुआ (उक्थम्) स्तोत्र, (न)(रयिः) दिया जाता हुआ धन, (न) और न ही (गीयमानम्) गाया जाता हुआ (गायत्रम्) गायत्र नामक सामगान (आ चिकेत) किसी से आदर किया जाता है ॥२॥
Essence
परमेश्वर में श्रद्धा न करनेवाले मनुष्य का स्त्रोत्रपाठ, धनदान, सामगान आदि सब निष्फल होता है, क्योंकि वह किसी स्वार्थ से ही प्रेरित होकर उन कार्यों को करता है। सब सत्कर्म ईश्वरार्पण-बुद्धि से ही शोभा पाते हैं ॥२॥
Subject
द्वितीय ऋचा पूर्वार्चिक में २२५ क्रमाङ्क पर व्याख्यात हो चुकी है। इन्द्र जगदीश्वर में श्रद्धा न रखनेवाले की क्या गति होती है, यह कहते हैं।