Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 18

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
औ꣣र्वभृगुव꣡च्छुचि꣢꣯मप्नवान꣣व꣡दा हु꣢꣯वे । अ꣣ग्नि꣡ꣳ स꣢मु꣣द्र꣡वा꣢ससम् ॥१८॥

औ꣣र्वभृगुव꣢त् । औ꣣र्व । भृगुव꣢त् । शु꣡चि꣢꣯म् । अ꣣प्नवानव꣢त् । आ । हु꣣वे । अग्नि꣢म् स꣣मुद्र꣡वा꣢ससम् । स꣣मुद्र꣢ । वा꣣ससम् ॥१८॥

Mantra without Swara
और्वभृगुवच्छुचिमप्नवानवदा हुवे । अग्निꣳ समुद्रवाससम् ॥

और्वभृगुवत् । और्व । भृगुवत् । शुचिम् । अप्नवानवत् । आ । हुवे । अग्निम् समुद्रवाससम् । समुद्र । वाससम् ॥१८॥

Samveda - Mantra Number : 18
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। मैं (और्वभृगुवत्) पार्थिव पदार्थों को तपानेवाले सूर्य के समान, और (अप्नवानवत्) क्रियासेवी वायु के समान (शुचिम्) पवित्र व पवित्रताकारक, और (समुद्रवाससम्) हृदयाकाश में व ब्रह्माण्डाकाश में निवास करनेवाले (अग्निम्) ज्योतिष्मान् तथा ज्योतिष्प्रद परमात्मा को (आहुवे) पुकारता हूँ ॥ द्वितीय—विद्युत् के पक्ष में। बिजली के प्रयोग के विषय में कहते हैं। मैं (और्वभृगुवत्) जैसे सूर्य को अर्थात् सूर्य के ताप को यन्त्रों आदि में प्रयुक्त करता हूँ, और (अप्नवानवत्) जैसे पाकादि कर्मों का सेवन करनेवाले पार्थिव अग्नि को यन्त्रों आदि में प्रयुक्त करता हूँ, वैसे ही (शुचिम्) प्रदीप्त, (समुद्रवाससम्) अन्तरिक्षनिवासी (अग्निम्) वैद्युत अग्नि को (आहुवे) प्रकाश के लिए तथा यान आदि में प्रयुक्त करने के लिए अपने समीप लाता हूँ ॥८॥ इस मन्त्र में उपमा और श्लेष अलङ्कार हैं ॥८॥
Essence
जैसे सूर्य और वायु पवित्र, पवित्रताकारक और सबके जीवनाधार हैं, वैसे ही परमात्मा भी है। जैसे सूर्य और वायु आकाश में निवास करते हैं, वैसे ही परमात्मा हृदयाकाश में और विश्वब्रह्माण्ड के आकाश में निवास करता है। ऐसे परमात्मा का सबको साक्षात्कार करना चाहिए। साथ ही सूर्याग्नि, पार्थिवाग्नि तथा वैद्युत अग्नि के द्वारा यान आदि चलाने चाहिएँ ॥८॥ जैसे और्व ऋषि, भृगु ऋषि और अप्नवान ऋषि शुचि अग्नि को बुलाते हैं, वैसे ही मैं बुला रहा हूँ, यह विवरणकार की व्याख्या है। भरतस्वामी का भी यही अभिप्राय है। सायण ने और्व और भृगु अलग-अलग नाम न मानकर एक और्वभृगु नाम माना है। यह सब व्याख्यान असंगत है, क्योंकि सृष्टि के आदि में प्रादुर्भूत वेदों में पश्चाद्वर्ती ऋषि आदिकों का इतिहास नहीं हो सकता ॥
Subject
कैसे परमात्मा का मैं आह्वान करता हूँ, यह कहते हैं।