Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1796

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्र꣣ या꣡व꣢त꣣स्त्व꣢मे꣣ता꣡व꣢द꣣ह꣡मीशी꣢य । स्तो꣣ता꣢र꣣मि꣡द्द꣢धिषे रदावसो꣣ न꣡ पा꣢प꣣त्वा꣡य꣢ रꣳसिषम् ॥१७९६॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । या꣡व꣢꣯तः । त्वम् । ए꣣ता꣡व꣢त् । अ꣣ह꣢म् । ई꣡शी꣢꣯य । स्तो꣣ता꣡र꣢म् । इत् । द꣣धिषे । रदावसो । रद । वसो । न꣢ । पा꣣पत्वा꣡य꣢ । र꣣ꣳसिषम् ॥१७९६॥

Mantra without Swara
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय । स्तोतारमिद्दधिषे रदावसो न पापत्वाय रꣳसिषम् ॥

यत् । इन्द्र । यावतः । त्वम् । एतावत् । अहम् । ईशीय । स्तोतारम् । इत् । दधिषे । रदावसो । रद । वसो । न । पापत्वाय । रꣳसिषम् ॥१७९६॥

Samveda - Mantra Number : 1796
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (यावतः) जितने धन के (त्वम्) आप अधीश्वर हो (एतावत्) उतने धन का यदि (अहम्) मैं (ईशीय) अधीश्वर हो जाऊँ, तो (रदावसो) हे धनदाता ! मैं (स्तोतारम् इत्) आपके उपासक का ही, उस धन से (दधिषे) धारण-पोषण करूँ, (पापत्वाय) पाप कर्म के लिए (न रंसिषम्) दान न करूँ ॥१॥
Essence
मनुष्य को चाहिए कि सत्पात्र को ही धन आदि का दान करे, पाप की वृद्धि के लिए कभी दान न दे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३१० क्रमाङ्क पर हो चुकी है। दान किसे चाहिए, इस विषय में कहते हैं।