Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1794

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ꣣रुव्य꣡च꣢से म꣣हि꣡ने꣢ सुवृ꣣क्ति꣢मिन्द्रा꣢꣯य꣣ ब्र꣡ह्म꣢ जनयन्त꣣ वि꣡प्राः꣢ । त꣡स्य꣢ व्र꣣ता꣢नि꣣ न꣡ मि꣢नन्ति꣣ धी꣡राः꣢ ॥१७९४॥

उ꣣रुव्य꣡च꣢से । उ꣣रु । व्य꣡च꣣से । म꣣हि꣡ने꣢ । सु꣣वृक्ति꣢म् । सु꣣ । वृक्ति꣢म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । ज꣣नयन्त । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । त꣡स्य꣢꣯ । व्र꣣ता꣡नि꣢ । न । मि꣣नन्ति । धी꣡राः꣢꣯ ॥१७९४॥

Mantra without Swara
उरुव्यचसे महिने सुवृक्तिमिन्द्राय ब्रह्म जनयन्त विप्राः । तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः ॥

उरुव्यचसे । उरु । व्यचसे । महिने । सुवृक्तिम् । सु । वृक्तिम् । इन्द्राय । ब्रह्म । जनयन्त । विप्राः । वि । प्राः । तस्य । व्रतानि । न । मिनन्ति । धीराः ॥१७९४॥

Samveda - Mantra Number : 1794
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(उरुव्यचसे) विद्या आदि में बहुत व्याप्तिवाले (महिने) महान् (इन्द्राय) परमात्मा वा आचार्य के लिए अर्थात् उनकी प्रसन्नता के लिए (विप्राः) विद्वान् जन (सुवृक्त्तिम्) उत्तम क्रिया और (ब्रह्म) ज्ञान-सङ्ग्रह (जनयन्त) करते हैं। (धीराः) बुद्धिमान् वे (तस्य) उस परमात्मा वा आचार्य के (व्रतानि) नियमों को (न मिनन्ति) नहीं तोड़ते हैं ॥२॥
Essence
बुद्धिमान् मनुष्यों को चाहिए कि वे परमात्मा और आचार्य से निर्धारित नियमों का सदैव पालन करें और उसके द्वारा प्रेय मार्ग और श्रेय मार्ग में अपनी उन्नति करें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और आचार्य का विषय कहा गया है।