Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1791

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
द्वि꣣ता꣡ यो वृ꣢꣯त्र꣣ह꣡न्त꣢मो वि꣣द꣡ इन्द्रः꣢꣯ श꣣त꣡क्र꣢तुः । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१७९१॥

द्वि꣣ता꣢ । यः । वृ꣣त्रह꣡न्त꣢मः । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯मः । वि꣣दे꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । श꣣त꣡क्र꣢तुः । श꣣त꣢ । क्र꣣तुः । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡रि꣢꣯भिः । सु꣣त꣢म् ॥१७९१॥

Mantra without Swara
द्विता यो वृत्रहन्तमो विद इन्द्रः शतक्रतुः । उप नो हरिभिः सुतम् ॥

द्विता । यः । वृत्रहन्तमः । वृत्र । हन्तमः । विदे । इन्द्रः । शतक्रतुः । शत । क्रतुः । उप । नः । हरिभिः । सुतम् ॥१७९१॥

Samveda - Mantra Number : 1791
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः इन्द्रः) जो जीवात्मा (वृत्रहन्तमः) काम, क्रोध आदि शत्रुओं का तथा व्याधि, स्त्यान आदि योग-विघ्नों का अतिशय विनाशक (शतक्रतुः) और बहुत से यज्ञ करनेवाला, इस प्रकार (द्विता) दो रूपों में (विदे) जाना जाता है, वह (नः) हमारे (हरिभिः) ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पन्न किये गये ज्ञान और कर्म को (उप) समीपता से प्राप्त करे ॥२॥
Essence
जीवात्मा के दो प्रकार के कर्म हैं, एक शत्रुओं का वध और दूसरा योग आदि यज्ञ की पूर्ति। उन्हें करने के लिए वह ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का उपयोग करके उन्नति के शिखर पर चढ़े ॥२॥
Subject
आगे फिर जीवात्मा का ही विषय वर्णित है।