Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1782

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बृहदुक्थो वामदेव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि꣣धुं꣡ द꣢द्रा꣣ण꣡ꣳ सम꣢꣯ने बहू꣣नां꣢ युवा꣢꣯न꣣ꣳ स꣡न्तं꣢ पलि꣣तो꣡ ज꣢गार । दे꣣व꣡स्य꣢ पश्य꣣ का꣡व्यं꣢ महि꣣त्वा꣢꣫द्या म꣣मा꣢र꣣ स꣡ ह्यः समा꣢꣯न ॥१७८२॥

वि꣣धु꣢म् । वि꣢ । धु꣢म् । द꣣द्राण꣢म् । स꣡म꣢꣯ने । सम् । अ꣣ने । बहूना꣢म् । यु꣡वा꣢꣯नम् । स꣡न्त꣢꣯म् । प꣣लितः꣢ । ज꣣गार । देव꣡स्य꣢ । प꣣श्य । का꣡व्य꣢꣯म् । म꣣हित्वा꣢ । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । म꣣मा꣡र꣢ । सः । ह्यः । सम् । आ꣣न ॥१७८२॥

Mantra without Swara
विधुं दद्राणꣳ समने बहूनां युवानꣳ सन्तं पलितो जगार । देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान ॥

विधुम् । वि । धुम् । दद्राणम् । समने । सम् । अने । बहूनाम् । युवानम् । सन्तम् । पलितः । जगार । देवस्य । पश्य । काव्यम् । महित्वा । अद्य । अ । द्य । ममार । सः । ह्यः । सम् । आन ॥१७८२॥

Samveda - Mantra Number : 1782
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(समने) सङ्ग्राम में (बहूनाम्) अनेक शत्रुओं को (विधुम्) बींधनेवाले, (दद्राणम्) उनकी दुर्गति करनेवाले (युवानं सन्तम्) युवा होते भी किसी वीर को (पलितः) बूढ़ा काल (जगार) निगल लेता है। (देवस्य) क्रीडा करनेवाले जगत्पति इन्द्र परमेश्वर के (महित्वा) महान् (काव्यम्) जगत्-रूप दृश्य काव्य को (पश्य) देखो, कि (सः) वह (अद्य) आज (ममार) मरा पड़ा है (यः) जो (ह्यः) कल (समान) भली-भाँति साँस ले रहा था, जीवित था ॥१॥
Essence
बड़ी भारी शक्ति जिनके पास होती है, वे भी मृत्यु के मुख में जाने से नहीं बच पाते, यह देखकर धर्म-कर्मों में और परमात्मा के चिन्तन में मन लगाना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३२५ क्रमाङ्क पर चन्द्र-सूर्य और मन-आत्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ दूसरी व्याख्या दर्शाते हैं।