Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1777

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- पदपङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ त꣢म꣣द्या꣢श्वं꣣ न꣢꣫ स्तोमैः꣣ क्र꣢तुं꣣ न꣢ भ꣣द्र꣡ꣳ हृ꣢दि꣣स्पृ꣡श꣢म् । ऋ꣣ध्या꣡मा꣢ त꣣ ओ꣡हैः꣢ ॥१७७७॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । तम् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । स्तो꣡मैः꣢꣯ । क्र꣡तु꣢꣯म् । न । भ꣣द्र꣢म् । हृ꣣दिस्पृ꣡श꣢म् । हृ꣣दि । स्पृ꣣श꣢म् । ऋ꣣ध्या꣡म꣢ । ते । ओ꣡हैः꣢꣯ ॥१७७७॥

Mantra without Swara
अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रꣳ हृदिस्पृशम् । ऋध्यामा त ओहैः ॥

अग्ने । तम् । अद्य । अ । द्य । अश्वम् । न । स्तोमैः । क्रतुम् । न । भद्रम् । हृदिस्पृशम् । हृदि । स्पृशम् । ऋध्याम । ते । ओहैः ॥१७७७॥

Samveda - Mantra Number : 1777
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) जीवननायक परमेश्वर ! (अद्य) आज (अश्वं न) व्यापक सूर्य के समान प्रकाशमान और (क्रतुं न) यज्ञ-कर्म के समान (भद्रम्) भद्र, (हदिस्पृशम्) हृदय में निवास करनेवाले (तम्) उस शरीरवर्ती अपने अन्तरात्मा को (ते ओहैः) तेरे द्वारा प्रेरित (स्तोमैः) वेदमन्त्रों से, हम (ऋध्याम) बढ़ायें, उद्बोधन दें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जो तेजस्वी और कर्मण्य जीवात्मा सबके ह्रदय में स्थित है,उसे उद्बोधक वेदमन्त्रों से अधिकाधिक उद्बोधन देना चाहिए तथा गुणगरिमा से बढ़ाना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वाचिक में ४३४ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की अर्चना के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहा जा रहा है।