Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1776

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣣य꣢꣫ꣳ स होता꣣ यो꣢ द्वि꣣ज꣢न्मा꣣ वि꣡श्वा꣢ द꣣धे꣡ वार्या꣢꣯णि श्रव꣣स्या꣢ । म꣢र्तो꣣ यो꣡ अ꣢स्मै सु꣣तु꣡को꣢ द꣣दा꣡श꣢ ॥१७७६॥

अय꣢म् । सः । हो꣡ता꣢ । यः । द्वि꣣ज꣡न्मा꣢ । द्वि꣣ । ज꣡न्मा꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯ । द꣣धे꣢ । वा꣡र्या꣢꣯णि । श्र꣣वस्या꣢ । म꣡र्तः꣢꣯ । यः । अ꣣स्मै । सुतु꣡कः꣢ । सु꣣ । तु꣡कः꣢꣯ । द꣣दा꣡श꣢ ॥१७७६॥

Mantra without Swara
अयꣳ स होता यो द्विजन्मा विश्वा दधे वार्याणि श्रवस्या । मर्तो यो अस्मै सुतुको ददाश ॥

अयम् । सः । होता । यः । द्विजन्मा । द्वि । जन्मा । विश्वा । दधे । वार्याणि । श्रवस्या । मर्तः । यः । अस्मै । सुतुकः । सु । तुकः । ददाश ॥१७७६॥

Samveda - Mantra Number : 1776
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः द्विजन्मा) जो माता-पिता से एक और आचार्य से दूसरा इस प्रकार दो जन्म प्राप्त करके द्विज हो जाता है, (सः अयम्) वह यह (होता) सबको विद्या, सुख आदि देनेवाला और होम करनेवाला होता है। साथ ही (विश्वा) सब (श्रवस्या) यश के योग्य (वार्याणि) वरणीय यम, नियम आदि कर्मों को (दधे) अपने जीवन में धारण कर लेता है। (यः) और जो (मर्तः) मनुष्य अर्थात् आचार्य (अस्मै) इसे (ददाश) विद्या देता है, वह उस सुशिक्षित विद्वान् द्विज से (सुतुकः) सुपुत्रवान् हो जाता है ॥३॥
Essence
आचार्य से विद्या पढ़कर, स्नातक हो, द्विज बनकर ऐसा आचरण करे, जिससे उसका यश सब जगह फैले। ऐसे गुणवान् द्विज से सचमुच आचार्य भी स्वयं को सुपुत्रवान् मानता है ॥३॥
Subject
आगे फिर द्विजन्मा का विषय है।