Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1773

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡स्य꣢ ते महि꣣ना꣢ म꣣हः꣡ परि꣢꣯ ज्मा꣣य꣡न्त꣢मी꣣य꣡तुः꣢ । ह꣢स्ता꣣ व꣡ज्र꣢ꣳ हिर꣣ण्य꣡य꣢म् ॥१७७३॥

य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । महिना꣢ । म꣣हः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । ज्मा꣣य꣡न्त꣢म् । ई꣣य꣡तुः꣢ । ह꣡स्ता꣢꣯ । व꣡ज्र꣢꣯म् । हि꣣रण्य꣡य꣢म् ॥१७७३॥

Mantra without Swara
यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः । हस्ता वज्रꣳ हिरण्ययम् ॥

यस्य । ते । महिना । महः । परि । ज्मायन्तम् । ईयतुः । हस्ता । वज्रम् । हिरण्ययम् ॥१७७३॥

Samveda - Mantra Number : 1773
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र ! हे परमेश्वर वा जीवात्मन् ! (महः) महान् (यस्य ते) जिस तेरी (महिना) महिमा से (हस्ता) मनुष्य के दोनों हाथ (ज्मायन्तम्) पृथिवी के समान आचरण करनेवाले अर्थात् विशाल, (हिरण्ययम्) ज्योतिर्मय (वज्रम्) व को (परि ईयतुः) ग्रहण करते हैं, वह तू (महित्वना आपप्राथ) महिमा से परिपूर्ण है। [यहाँ ‘महित्वना आपप्राथ’ यह वाक्यपूर्ति के लिए पूर्व मन्त्र से लिया गया है] ॥३॥
Essence
मनुष्य जो विविध शस्त्रास्त्रों का ग्रहण, उन्हें चलाना, शत्रु को जीतना आदि महान् कर्मों को करने में समर्थ होता है, वह महिमा परमेश्वर और जीवात्मा की ही है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर और जीवात्मा का महत्त्व वर्णित है।