Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1770

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधो वामदेवो वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣢ स्रु꣣त꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थ꣢꣫ इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः ॥१७७०॥

वि । स्रु꣣त꣡यः꣢ । य꣡था꣢꣯ । प꣣थः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वत् । य꣣न्तु । रात꣡यः꣢ ॥१७७०॥

Mantra without Swara
वि स्रुतयो यथा पथ इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः ॥

वि । स्रुतयः । यथा । पथः । इन्द्र । त्वत् । यन्तु । रातयः ॥१७७०॥

Samveda - Mantra Number : 1770
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यथा) जिस प्रकार (पथः) राजमार्ग से (सुतयः) छोटे-छोटे मार्ग विविध दिशाओं में जाते हैं, उसी प्रकार हे (इन्द्र) जगदीश्वर वा आचार्य ! (त्वत्) आपके पास से (रातयः) ऐश्वर्यों के दान वा विद्या-दान (वियन्तु) विविध लोगों के पास जाएँ ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे राजमार्ग से विविध छोटे-छोटे मार्ग निकल कर पथिकों का उपकार करते हैं, वैसे ही परमेश्वर और आचार्य से दिव्य गुण-कर्म और विविध विद्याएँ निकल कर उपासकों वा शिष्यों को उपकृत करें ॥३॥
Subject
तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में ४५३ क्रमाङ्क पर परमात्मा, जीवात्मा और राजा को सम्बोधन की गयी थी। यहाँ परमेश्वर और आचार्य को कहते हैं।