Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1757

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ꣡र्च꣢न्ति꣣ ना꣡री꣢र꣣प꣢सो꣣ न꣢ वि꣣ष्टि꣡भिः꣢ समा꣣ने꣢न꣣ यो꣡ज꣢ने꣣ना꣡ प꣢रा꣣व꣡तः꣢ । इ꣢षं꣣ व꣡ह꣢न्तीः सु꣣कृ꣡ते꣢ सु꣣दा꣡न꣢वे꣣ वि꣢꣫श्वेदह꣣ य꣡ज꣢मानाय सु꣣न्व꣢ते ॥१७५७॥

अ꣡र्च꣢꣯न्ति । ना꣡रीः꣢꣯ । अ꣣प꣡सः꣢ । न । वि꣣ष्टि꣡भिः꣢ । स꣣माने꣡न꣢ । स꣣म् । आने꣡न꣢ । यो꣡ज꣢꣯नेन । आ । प꣣राव꣡तः꣢ । इ꣡ष꣢꣯म् । व꣡ह꣢꣯न्तीः । सु꣣कृ꣡ते꣢ । सु꣣ । कृ꣡ते꣢꣯ । सु꣣दा꣡न꣢वे । सु꣣ । दा꣡न꣢꣯वे । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । अ꣡ह꣢꣯ । य꣡ज꣢꣯मानाय । सु꣣न्वते꣢ ॥१७५७॥

Mantra without Swara
अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः । इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते ॥

अर्चन्ति । नारीः । अपसः । न । विष्टिभिः । समानेन । सम् । आनेन । योजनेन । आ । परावतः । इषम् । वहन्तीः । सुकृते । सु । कृते । सुदानवे । सु । दानवे । विश्वा । इत् । अह । यजमानाय । सुन्वते ॥१७५७॥

Samveda - Mantra Number : 1757
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अपसः) कर्मण्य (नारीः न) नारियाँ जैसे (आ परावतः) दूरदेश से भी आकर (समानेन योजनेन) समान योजना बनाकर (विष्टिभिः) कर्मों द्वारा (सुकृते) धर्मात्मा (सुदानवे) उत्तम दानी मनुष्य को (इषम्) अन्न आदि पदार्थ और (सुन्वते) भक्तिरस प्रवाहित करनेवाले तथा (यजमानाय) यज्ञ करनेवाले पुरुष को (अह) निश्चय ही (विश्वा इत्) सभी अभीष्ट वस्तुएँ (वहन्तीः) प्राप्त कराती हुई, उसका (अर्चन्ति) सत्कार करती हैं, वैसे ही ये प्राकृतिक और आध्यात्मिक उषाएँ भी करती हैं ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जो शुभ कर्म करनेवाले धर्मात्मा, परोपकारी परमेश्वर के उपासक यज्ञकर्ता जन होते हैं, उनका जैसे नारियाँ सत्कार करती हैं, वैसे ही रात्रि के अन्त में लालिमा के साथ छिटकती हुई प्राकृतिक उषाएँ तथा योगमार्ग में अनुभव की हुई ज्योतिष्मती प्रजाएँ भी उनका अभिनन्दन करती हैं अर्थात् प्रेय-मार्ग तथा श्रेय-मार्ग में उनकी सहायता करती हैं ॥३॥
Subject
आगे फिर वही उषा वर्णित की जा रही है।