Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1731

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ꣢ष꣣स्त꣢च्चि꣣त्र꣡मा भ꣢꣯रा꣣स्म꣡भ्यं꣢ वाजिनीवति । ये꣡न꣢ तो꣣कं꣢ च꣣ त꣡न꣢यं च꣣ धा꣡म꣢हे ॥१७३१॥

उ꣡षः꣢꣯ । तत् । चि꣣त्र꣢म् । आ । भ꣣र । अस्म꣡भ्य꣢म् । वा꣣जिनीवति । ये꣡न꣢꣯ । तो꣣क꣢म् । च꣣ । त꣡न꣢꣯यम् । च꣣ । धा꣡म꣢꣯हे ॥१७३१॥

Mantra without Swara
उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति । येन तोकं च तनयं च धामहे ॥

उषः । तत् । चित्रम् । आ । भर । अस्मभ्यम् । वाजिनीवति । येन । तोकम् । च । तनयम् । च । धामहे ॥१७३१॥

Samveda - Mantra Number : 1731
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (वाजिनीवति) विवेकपूर्ण क्रियावाली (उषः) तेजोमयी जगन्माता ! तू (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (तत्) वह प्रसिद्ध (चित्रम्) अद्भुत भौतिक तथा दिव्य ऐश्वर्य (आ भर) ला, (येन) जिससे, हम (तोकं च तनयं च) पुत्र और पौत्र को (धामहे) परिपुष्ट करें ॥१॥
Essence
उषा के समान तेजस्विनी जगन्माता जगत् की व्यवस्था के लिए सब क्रियाओं को करती हुई अपनी सन्तानों को सब आध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करती हुई सुखकारिणी होती है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में उषा नाम द्वारा जगदम्बा से प्रार्थना की गयी है।