Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1729

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
या꣢ द꣣स्रा꣡ सिन्धु꣢꣯मातरा मनो꣣त꣡रा꣢ रयी꣣णा꣢म् । धि꣣या꣢ दे꣣वा꣡ व꣢सु꣣वि꣡दा꣢ ॥१७२९॥

या꣢ । द꣣स्रा꣢ । सि꣡न्धु꣢꣯मातरा । सि꣡न्धु꣢꣯ । मा꣣तरा । मनोत꣡रा꣢ । र꣣यीणा꣢म् । धि꣣या꣢ । दे꣣वा꣢ । व꣣सुवि꣡दा꣢ । वसु꣣ । वि꣡दा꣢꣯ ॥१७२९॥

Mantra without Swara
या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम् । धिया देवा वसुविदा ॥

या । दस्रा । सिन्धुमातरा । सिन्धु । मातरा । मनोतरा । रयीणाम् । धिया । देवा । वसुविदा । वसु । विदा ॥१७२९॥

Samveda - Mantra Number : 1729
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(या) जो मन-आत्मा रूप अश्वीयुगल (दस्रा) दोषों को नष्ट करनेवाले, (सिन्धुमातरा) आनन्दस्राविणी जगदम्बा जिनका माता के समान पालन करनेवाली है, ऐसे (रयीणाम्) सत्य, अहिंसा आदि वा स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य आदि ऐश्वर्यों को (मनोतरा) अतिशय दीप्त करनेवाले, (देवा) बल के दाता और (धिया) प्रज्ञा तथा कर्म से (वसुविदा) योगसिद्धिरूप ऐश्वर्य को प्राप्त करानेवाले हैं, उनकी मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ। [यहाँ ‘स्तुषे’ पद पूर्व मन्त्र से लिया गया है] ॥२॥
Essence
मन और आत्मा को साधने से दोषों का क्षय, स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य, बल, सत्य-अहिंसा आदि ऐश्वर्य और योगसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में मन और आत्मा के गुण-कर्मों का वर्णन है।