Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1725

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ति꣣ ष्या꣢ सू꣣न꣢री꣣ ज꣡नी꣢ व्यु꣣च्छ꣢न्ती꣣ प꣢रि꣣ स्व꣡सुः꣢ । दि꣣वो꣡ अ꣢दर्शि दुहि꣣ता꣢ ॥१७२५॥

प्र꣡ति꣢꣯ । स्या । सू꣣न꣡री꣢ । सु꣣ । न꣡री꣢꣯ । ज꣡नी꣢꣯ । व्यु꣣च्छ꣡न्ती꣢ । वि꣣ । उच्छ꣡न्ती꣢ । प꣡रि꣢꣯ । स्व꣡सुः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ । अ꣣दर्शि । दुहिता꣢ ॥१७२५॥

Mantra without Swara
प्रति ष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः । दिवो अदर्शि दुहिता ॥

प्रति । स्या । सूनरी । सु । नरी । जनी । व्युच्छन्ती । वि । उच्छन्ती । परि । स्वसुः । दिवः । अदर्शि । दुहिता ॥१७२५॥

Samveda - Mantra Number : 1725
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—प्राकृतिक उषा के पक्ष में। (सूनरी) उत्तम नेत्री, (जनी) प्रकाश की जननी, (स्वसुः) बहिन रात्रि के (परि) समाप्तिकाल में (व्युच्छन्ती) अँधेरे को हटाती हुई, (दिवः) द्युलोक की (दुहिता) पुत्री (स्या) वह उषा (प्रति अदर्शि) पूर्व दिशा में दिखायी दे रही है ॥ द्वितीय—दिव्य उषा के पक्ष में। (सूनरी) योगमार्ग में उत्तम नेतृत्व करनेवाली, (जनी) मोक्ष की जननी, (स्वसुः) संसारमार्ग पर डालनेवाली अविद्या की (परि) समाप्ति पर (व्युच्छन्ती) उदित होती हुई, (दिवः) प्रकाशमय सविकल्पक समाधि की (दुहिता) पुत्री-तुल्य (स्या) वह ऋतम्भरा प्रज्ञा (प्रति अदर्शि) साक्षात् अनुभव में आ रही है ॥१॥ यहाँ श्लेष और स्वभावोक्ति अलङ्कार हैं ॥१॥
Essence
१. ऋ० ४।५२।१। २. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रेऽस्मिन्नुषस इव स्त्रिया गुणानाह।
Subject
प्रथम मन्त्र में भौतिक उषा के दृष्टान्त से दिव्य उषा का वर्णन किया गया है।