Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1721

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवातिथिः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य꣡था꣢ गौ꣣रो꣢ अ꣢पा꣣ कृ꣣तं꣢꣫ तृष्य꣣न्ने꣡त्यवेरि꣢꣯णम् । आ꣣पित्वे꣡ नः꣢ प्रपि꣣त्वे꣢꣫ तूय꣣मा꣡ ग꣢हि꣣ क꣡ण्वे꣢षु꣣ सु꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢ ॥१७२१॥

य꣡था꣢꣯ । गौ꣣रः꣢ । अ꣣पा꣢ । कृ꣣त꣢म् । तृ꣡ष्य꣢꣯न् । ए꣡ति꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯ । इ꣡रि꣢꣯णम् । आ꣣पित्वे꣢ । नः꣣ । प्रपित्वे꣢ । तू꣡य꣢꣯म् । आ । ग꣣हि । क꣡ष्वे꣢꣯षु । सु । स꣡चा꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ ॥१७२१॥

Mantra without Swara
यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम् । आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब ॥

यथा । गौरः । अपा । कृतम् । तृष्यन् । एति । अव । इरिणम् । आपित्वे । नः । प्रपित्वे । तूयम् । आ । गहि । कष्वेषु । सु । सचा । पिब ॥१७२१॥

Samveda - Mantra Number : 1721
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यथा) जैसे (तृष्यन्) प्यासा (गौरः) गौर मृग (इरिणम्) मरूस्थल को (अव) छोड़कर (अपा कृतम्) जल से पूर्ण सरोवर को (एति) प्राप्त करता है, वैसे ही हे विद्यार्थी ! तू (नः) हम गुरुओं से (आपित्वे) सम्बन्ध (प्रपित्वे) प्राप्त होने पर, हमारे पास (तूयम्) शीघ्र (आ गहि) आ जा और (कण्वेषु) हम मेधावियों के सान्निध्य में (सचा) दूसरे सहाध्यायियों के साथ मिलकर (सु पिब) भली-भाँति लौकिक विद्याओं के रस का तथा अध्यात्म-विद्याओं के रस का पान कर ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे प्यासा मृग जलरहित प्रदेश को छोड़कर जलप्रचुर प्रदेश को चला जाता है, वैसे ही विद्या के प्यासे लोग मूर्खों का सङ्ग छोड़ कर विद्वानों का सङ्ग करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २५२ क्रमाङ्क पर परमात्मा के आह्वान के विषय में की गयी थी। यहाँ विद्वान् गुरुजन शिष्यजनों को कह रहे हैं।