Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1720

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ग꣣म्भीरा꣡ꣳ उ꣢द꣣धी꣡ꣳरि꣢व꣣ क्र꣡तुं꣢ पुष्यसि꣣ गा꣡ इ꣢व । प्र꣡ सु꣢गो꣣पा꣡ यव꣢꣯सं धे꣣न꣡वो꣢ यथा ह्र꣣दं꣢ कु꣣ल्या꣡ इ꣢वाशत ॥१७२०॥

ग꣣म्भीरा꣢न् । उ꣣दधी꣢न् । उ꣣द । धी꣢न् । इ꣣व । क्र꣡तु꣢꣯म् । पु꣣ष्यसि । गाः꣢ । इ꣣व । प्र꣢ । सु꣣गोपाः꣢ । सु꣣ । गोपाः꣢ । य꣡व꣢꣯सम् । धे꣣न꣡वः꣢ । य꣣था । ह्रद꣢म् । कु꣣ल्याः꣢ । इ꣣व । आशत ॥१७२०॥

Mantra without Swara
गम्भीराꣳ उदधीꣳरिव क्रतुं पुष्यसि गा इव । प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा ह्रदं कुल्या इवाशत ॥

गम्भीरान् । उदधीन् । उद । धीन् । इव । क्रतुम् । पुष्यसि । गाः । इव । प्र । सुगोपाः । सु । गोपाः । यवसम् । धेनवः । यथा । ह्रदम् । कुल्याः । इव । आशत ॥१७२०॥

Samveda - Mantra Number : 1720
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे पवमान सोम ! हे पवित्रकर्ता जगदीश्वर ! (गम्भीरान्) अगाध (उदधीन् इव) समुद्रों को जैसे आप पुष्ट करते हो और (गाः इव) जैसे पृथिवी आदि लोकों को वा धेनुओं को आप पुष्ट करते हो, वैसे ही (क्रतुम्) कर्मकर्ता जीवात्मा को (पुष्यसि) पुष्ट करते हो। हे जीवात्मन् ! (यवसम्) घास-चारे को (धेनवः यथा) जैसे गायें और (हृदम्) सरोवर को (कुल्याः इव) जैसे शुद्ध जल की नालियाँ प्राप्त होती हैं, वैसे ही (सुगोपाः) सुरक्षा करनेवाले आनन्द-रस, तुझे (प्र आशत) प्रकृष्ट रूप से प्राप्त होते हैं ॥३॥ यहाँ चार उपमाएँ हैं, अतः उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जगदीश्वर जैसे जलों से समुद्रों को, दूध से धेनुओं को और विविध ऐश्वर्यों से पृथिवी आदि लोकों को परिपूर्ण करते हैं, वैसे ही जीवात्मा को सद्गुणों से परिपूर्ण करते हैं। गौएँ जैसे घास के पास पहुँचती हैं और छोटी-छोटी नहरें जैसी महान् जलाशय को भरने के लिए उनमें पहुँचती हैं, वैसे ही जगदीश्वर के पास से ब्रह्मानन्द-रस जीवात्मा को प्राप्त होते हैं ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में उपमाओं द्वारा परमात्मा का कर्म और जीवात्मा की उपलब्धि वर्णित है।