Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1705

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वा र꣣ण्व꣡सं꣢दृशं꣣ प्र꣡य꣢स्वन्तः सहस्कृत । अ꣡ग्ने꣢ ससृ꣣ज्म꣢हे꣣ गि꣡रः꣢ ॥१७०५॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । रण्व꣡स꣢न्दृशम् । र꣣ण्व꣢ । स꣣न्दृशम् । प्र꣡य꣢꣯स्वन्तः । स꣣हस्कृत । सहः । कृत । अ꣡ग्ने꣢꣯ । स꣣सृज्म꣡हे꣢ । गि꣡रः꣢꣯ ॥१७०५॥

Mantra without Swara
उप त्वा रण्वसंदृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत । अग्ने ससृज्महे गिरः ॥

उप । त्वा । रण्वसन्दृशम् । रण्व । सन्दृशम् । प्रयस्वन्तः । सहस्कृत । सहः । कृत । अग्ने । ससृज्महे । गिरः ॥१७०५॥

Samveda - Mantra Number : 1705
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सहस्कृत) आत्मबल से हृदय में प्रकट किये गये (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! (प्रयस्वन्तः) प्रयत्नवान् हम (रण्वसन्दृशम्) रमणीय दर्शनवाले (त्वा) आपके प्रति (गिरः) स्तुति-वाणियों को (उप ससृज्महे) उच्चारण करते हैं ॥१॥
Essence
परमात्मा की स्तुति के साथ मनुष्यों को प्रयत्न भी करना चाहिए, तभी अभीष्ट कामनाएँ पूर्ण होती हैं ॥१॥
Subject
अगले मन्त्र में अग्नि नाम से परमात्मा को सम्बोधन करते हैं।