Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1698

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य꣢ उ꣣ग्रः꣡ सन्ननि꣢꣯ष्टृतः स्थि꣣रो꣡ रणा꣢꣯य꣣ स꣡ꣳस्कृ꣢तः । य꣡दि꣢ स्तो꣣तु꣢र्म꣣घ꣡वा꣢ शृ꣣ण꣢व꣣द्ध꣢वं꣣ ने꣡न्द्रो꣢ योष꣣त्या꣡ ग꣢मत् ॥१६९८॥

यः । उ꣣ग्रः꣢ । सन् । अ꣡नि꣢꣯ष्टृतः । अ । नि꣣ष्टृतः । स्थिरः꣢ । र꣡णा꣢꣯य । स꣡ꣳस्कृ꣢꣯तः । सम् । कृ꣣तः । य꣡दि꣢ । स्तो꣣तुः꣢ । म꣣घ꣡वा꣢ । शृ꣣ण꣡व꣢त् । ह꣡व꣢꣯म् । न । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यो꣣षति । आ꣢ । ग꣣मत् ॥१६९८॥

Mantra without Swara
य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय सꣳस्कृतः । यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत् ॥

यः । उग्रः । सन् । अनिष्टृतः । अ । निष्टृतः । स्थिरः । रणाय । सꣳस्कृतः । सम् । कृतः । यदि । स्तोतुः । मघवा । शृणवत् । हवम् । न । इन्द्रः । योषति । आ । गमत् ॥१६९८॥

Samveda - Mantra Number : 1698
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो इन्द्र जगदीश्वर (उग्रः सन्) अधार्मिकों के लिए प्रचण्ड होता हुआ (अनिष्टृतः) उनसे अहिंसित रहता है और (स्थिरः) अविचल होता हुआ (रणाय) असुरों के साथ युद्ध के लिए (संस्कृतः) सज्जित हो जाता है, वह (मघवा) ऐश्वर्यवान् (इन्द्रः) जगदीश्वर (यदि) यदि (स्तोतुः) उपासक के (हवम्) आह्वान को (शृणवत्) सुन ले, तो (न योषति) उससे अलग न खड़ा रहे, प्रत्युत (आ गमत्) उसके अन्तःकरण में आ जाए ॥३॥
Essence
उपासक के हृदय से निकली हुई पुकार को जगदीश्वर अवश्य सुनता है और दस्युओं के साथ युद्ध में उसे बल देकर उसकी सहायता करता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा, उपास्य-उपासक का सम्बन्ध, आत्मा और मन, इन विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ अठारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।