Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1687

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तं꣡ गू꣢र्धया꣣꣬ स्व꣢꣯र्णरं दे꣣वा꣡सो꣢ दे꣣व꣡म꣢र꣣तिं꣡ द꣢धन्विरे । दे꣣वत्रा꣢ ह꣣व्य꣡मू꣢हिषे ॥१६८७॥

त꣢म् । गू꣢꣯र्धय । स्व꣡र्णरम् । स्वः꣡ । न꣣रम् । देवा꣡सः꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣣रति꣢म् । द꣣धन्विरे । देवत्रा꣢ । ह꣣व्य꣡म् । ऊ꣣हिषे ॥१६८७॥

Mantra without Swara
तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे । देवत्रा हव्यमूहिषे ॥

तम् । गूर्धय । स्वर्णरम् । स्वः । नरम् । देवासः । देवम् । अरतिम् । दधन्विरे । देवत्रा । हव्यम् । ऊहिषे ॥१६८७॥

Samveda - Mantra Number : 1687
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे मानव ! तू (तम्) उस प्रसिद्ध, (स्वर्णरम्) ब्रह्मानन्द वा दिव्य प्रकाश को प्राप्त करानेवाले जगन्नायक परमात्मा की(गूर्धय) अर्चना कर। (देवासः) विद्वान्, दिव्य गुणोंवाले लोग, उस (देवम्) प्रकाशक, (अरतिम्) सबके स्वामी जगदीश्वर को (दधन्विरे) अपने आत्मा में धारण करते हैं। हे ज्योतिर्मय देव ! आप (देवत्रा) विद्वान् जनों में (हव्यम्) देने योग्य सद्गुण-समूह को (ऊहिषे) प्राप्त कराओ ॥१॥
Essence
जो मनुष्य श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाले परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे स्वयं भी वैसे हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में १०९ क्रमाङ्क पर व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा की स्तुति का विषय कहते हैं।