Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1666

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡द्वो꣢ गाय सु꣣ते꣡ सचा꣢꣯ पुरुहू꣣ता꣢य꣣ स꣡त्व꣢ने । शं꣢꣫ यद्गवे꣣ न꣢ शा꣣कि꣡ने꣢ ॥१६६६॥

त꣢त् । वः꣣ । गाय । सुते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । पु꣣रुहूता꣡य꣢ । पु꣣रु । हूता꣡य꣢ । स꣡त्व꣢꣯ने । शम् । यत् । ग꣡वे꣢꣯ । न । शा꣣कि꣡ने꣢ ॥१६६६॥

Mantra without Swara
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्गवे न शाकिने ॥

तत् । वः । गाय । सुते । सचा । पुरुहूताय । पुरु । हूताय । सत्वने । शम् । यत् । गवे । न । शाकिने ॥१६६६॥

Samveda - Mantra Number : 1666
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे साथी ! (वः) तू (सुते) श्रद्धा-रस के उत्पन्न होने पर (सचा) अन्य स्तोताओं के साथ (पुरुहूताय) बहुतों से बुलाये गये, (सत्वने) बलशाली इन्द्र परमात्मा के लिए (तत् गाय) उसी गीत को गा (यत्) जो गीत (शाकिने गवे न) घास-भक्षी बैल के समान (शाकिने) शक्तिमान् (गवे) तुझ स्तोता के लिए (शम्) शान्तिदायक हो ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
श्रद्धा से भरे हुए चित्त से जिस स्तुति-गीत का उपहार जगदीश्वर को दिया जाता है, वह स्तोता के लिए बहुत कल्याणकारी होता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ११५ क्रमाङ्क पर परमात्मा के गान के विषय में की जा चुकी है। यहाँ भी वही विषय है।