Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1656

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नी꣢꣯व शी꣣र्षा꣡णि꣢ मृढ्वं꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡प꣢स्य तिष्ठति । शृ꣡ङ्गे꣢भिर्द꣣श꣡भि꣢र्दि꣣श꣢न् ॥१६५६

नि꣢ । इ꣣व । शीर्षा꣡णि꣢ । मृ꣣ढ्वम् । म꣡ध्ये꣢꣯ । आ꣡प꣢꣯स्य । ति꣣ष्ठति । शृ꣡ङ्गे꣢꣯भिः । द꣣श꣡भिः꣢ । दि꣣श꣢न् ॥१६५६॥

Mantra without Swara
नीव शीर्षाणि मृढ्वं मध्य आपस्य तिष्ठति । शृङ्गेभिर्दशभिर्दिशन् ॥१६५६

नि । इव । शीर्षाणि । मृढ्वम् । मध्ये । आपस्य । तिष्ठति । शृङ्गेभिः । दशभिः । दिशन् ॥१६५६॥

Samveda - Mantra Number : 1656
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
इन्द्र जगदीश्वर (दशभिः) दस (शृङ्गेभिः) सींगों से अर्थात् पृथिवी, अप्, तेजस्, वायु, आकाश इन पञ्च स्थूलभूतों तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द इन पाँच सूक्ष्मभूतों से (दिशन्) जगत्प्रपञ्च का सर्जन करता हुआ (आपस्य) व्याप्त ब्रह्माण्ड के (मध्ये) अन्दर(तिष्ठति) विद्यमान है। हे मनुष्यो ! तुम उसकी सत्ता में विश्वास करके (शीर्षाणि) अपने मस्तिष्कों को (नि मृढ़्वम् इव) माँज लो ॥३॥
Essence
चर्मचक्षुओं से जगत् के सञ्चालनकर्ता किसी को न देखते हुए जो लोग परमेश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते, वे व्यर्थ ही भ्रम में पड़े हुए हैं। जो श्रद्धा का दीप प्रज्वलित कर लेते हैं, वे कण-कण में परमेश्वर को देखते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राजा और योगी के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ सत्रहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥ अष्टम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
Subject
अब परमात्मा की व्यापकता का वर्णन करते हैं।