Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1651

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡म꣢स्य म꣣न्य꣢वे꣣ वि꣢शो꣣ वि꣡श्वा꣢ नमन्त कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡ये꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः ॥१६५१॥

स꣢म् । अ꣣स्य । मन्य꣡वे꣢ । वि꣡शः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । न꣣मन्त । कृष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡य꣢ । स꣣म् । उद्रा꣡य꣢ । इ꣣व । सि꣡न्ध꣢꣯वः ॥१६५१॥

Mantra without Swara
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः । समुद्रायेव सिन्धवः ॥

सम् । अस्य । मन्यवे । विशः । विश्वाः । नमन्त । कृष्टयः । समुद्राय । सम् । उद्राय । इव । सिन्धवः ॥१६५१॥

Samveda - Mantra Number : 1651
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
जैसे (अस्य) इस इन्द्र राजा के (मन्यवे) क्रोध के सम्मुख (विश्वाः) सब (कृष्टयः) विनाशक (विशः) शत्रु-सेनाएँ (सं नमन्त) झुक जाती हैं, वैसे ही (अस्य) इस इन्द्र परमात्मा के (मन्यवे) तेज के सम्मुख (विश्वाः) सब (कृष्टयः) योगाभ्यासरूप कृषि करनेवाली (विशः) प्रजाएँ (सं नमन्त) नम्र हो जाती हैं, (समुद्राय इव) जैसे समुद्र को प्राप्त करने के लिए (सिन्धवः) नदियाँ (सं नमन्त) नम्र अर्थात् नीचे की ओर बहनेवाली हो जाती हैं ॥१॥ यहाँ उपमा और श्लेष अलङ्कार है ॥१॥
Essence
जगदीश्वर का प्रताप, प्रभाव और महत्त्व सबसे महान् है, जिसके संमुख सभी नतमस्तक होते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १३७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ राजा के दृष्टान्त से परमात्मा का विषय वर्णित है।