Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1637

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ प्र꣡तू꣢र्तिष्व꣣भि꣡ विश्वा꣢꣯ असि꣣ स्पृ꣡धः꣢ । अ꣣शस्तिहा꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ वृ꣢त्र꣣तू꣡र꣢सि꣣ त्वं꣡ तू꣢र्य तरुष्य꣣तः꣢ ॥१६३७॥

त्व꣢म् । इ꣣न्द्र । प्र꣡तू꣢꣯र्तिषु । प्र । तू꣣र्तिषु । अभि꣢ । वि꣡श्वाः꣢ । अ꣣सि । स्पृ꣡धः꣢꣯ । अ꣣शस्तिहा꣢ । अ꣣शस्ति । हा꣢ । ज꣣निता꣢ । वृ꣣त्रतूः꣢ । वृ꣣त्र । तूः꣢ । अ꣣सि । त्व꣡म् । तू꣣र्य । तरुष्यतः꣢ ॥१६३७॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः । अशस्तिहा जनिता वृत्रतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः ॥

त्वम् । इन्द्र । प्रतूर्तिषु । प्र । तूर्तिषु । अभि । विश्वाः । असि । स्पृधः । अशस्तिहा । अशस्ति । हा । जनिता । वृत्रतूः । वृत्र । तूः । असि । त्वम् । तूर्य । तरुष्यतः ॥१६३७॥

Samveda - Mantra Number : 1637
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) विघ्नों को दूर करनेवाले परमात्मन् वा जीवात्मन् ! तुम (प्रतूर्तिषु) वेगवाले देवासुरसङ्ग्रामों में (विश्वाः) सब(स्पृधः) प्रतिस्पर्धा करनेवाली काम, क्रोध आदि की सेनाओं को (अभि असि) परास्त कर देते हो। तुम (अशस्तिहा) अप्रशस्तियों को मारनेवाले, (जनिता) प्रशस्ति कारक श्रेष्ठ गुणों तथा कर्मों को जन्म देनेवाले और (वृत्रतूः) पापों की हिंसा करनेवाले (असि) हो। (त्वम्) तुम (तरुष्यतः) हिंसकों को (तूर्य) विनष्ट करो ॥१॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि परमात्मा से प्रार्थना करके और अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर सभी आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को जीतकर अपने उन्नति के मार्ग को निष्कण्टक करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ३११ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की जा चुकी है, यहाँ परमात्मा और जीवात्मा को सम्बोधन किया जा रहा है।