Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1634

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢श्वं꣣ न꣢ त्वा꣣ वा꣡र꣢वन्तं व꣣न्द꣡ध्या꣢ अ꣣ग्निं꣡ नमो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तमध्व꣣रा꣡णा꣢म् ॥१६३४॥

अ꣡श्व꣢꣯म् । न । त्वा꣣ । वा꣡र꣢꣯वन्तम् । व꣣न्द꣡ध्यै꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । न꣡मो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तम् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯न्तम् । अ꣣ध्वरा꣡णा꣢म् ॥१६३४॥

Mantra without Swara
अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः । सम्राजन्तमध्वराणाम् ॥

अश्वम् । न । त्वा । वारवन्तम् । वन्दध्यै । अग्निम् । नमोभिः । सम्राजन्तम् । सम् । राजन्तम् । अध्वराणाम् ॥१६३४॥

Samveda - Mantra Number : 1634
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(वारवन्तम्) मलिनता-निवारक किरण रूप बालों से युक्त (अश्वं न) सूर्य के समान (वारवन्तम्) दोष-निवारण के सामर्थ्य से युक्त, (अध्वराणाम्) सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति आदि यज्ञों के वा शिक्षा-यज्ञों के (राजन्तम्) सम्राट् (अग्निं त्वाम्) आप नायक परमात्मा वा आचार्य को (नमोभिः) नमस्कारों से (वन्दध्यै) वन्दना करने के लिए, मैं बुलाता हूँ ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे सूर्य अपने किरण-समूह से भूमि पर स्थित मलिनता आदि को दूर करता है, वैसे ही परमेश्वर और आचार्य अपने स्वच्छ करने के सामर्थ्य से मनुष्यों के पाप, दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख आदि दूर करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में (१७ क्रमाङ्क पर) परमात्मा को सम्बोधन की गयी थी। यहाँ एक साथ परमात्मा और आचार्य दोनों को कह रहे हैं।