Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1613

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स꣡ने꣢मि꣣ त्व꣢म꣣स्म꣡दा अदे꣢꣯वं꣣ कं꣡ चि꣢द꣣त्रि꣡ण꣢म् । सा꣣ह्वा꣡ꣳ इ꣢न्दो꣣ प꣢रि꣣ बा꣢धो꣣ अ꣡प꣢ द्व꣣यु꣢म् ॥१६१३॥

स꣡ने꣢꣯मि । त्वम् । अ꣣स्म꣢त् । आ । अ꣡दे꣢꣯वम् । अ । दे꣣वम् । क꣢म् । चि꣣त् । अत्रि꣡ण꣢म् । सा꣣ह्वा꣢न् । इ꣣न्दो । प꣡रि꣢꣯ । बा꣡धः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्व꣣यु꣢म् ॥१६१३॥

Mantra without Swara
सनेमि त्वमस्मदा अदेवं कं चिदत्रिणम् । साह्वाꣳ इन्दो परि बाधो अप द्वयुम् ॥

सनेमि । त्वम् । अस्मत् । आ । अदेवम् । अ । देवम् । कम् । चित् । अत्रिणम् । साह्वान् । इन्दो । परि । बाधः । अप । द्वयुम् ॥१६१३॥

Samveda - Mantra Number : 1613
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) तेजस्वी जीवात्मन् वा परमात्मन् ! (त्वम्) शक्तिशाली तू (सनेमि) पुरानी मित्रता को (अस्मत्) हमारे प्रति (आ) ला।(अदेवम्) न देनेवाले, सहायता न करनेवाले (कंचित्) किसी भी(अत्रिणम्) भक्षक पाप, दुर्व्यसन आदि को वा दुर्जन को (अप) दूर कर दे। (साह्वान्) शत्रुओं को पराजित करनेवाला तू (बाधः) बाधकों को (परि) चारों ओर विनष्ट कर, (द्वयुम्) सत्य-असत्य दोनों से युक्त अथवा पीछे कुछ और सामने कुछ या मन में कुछ और वचन में कुछ इस द्विविध आचरणवाले, छल-छद्म का व्यवहार करनेवाले मनुष्य को (अप) दूर कर दे ॥३॥
Essence
जीवात्मा को प्रोत्साहन देकर और परमात्मा की उपासना करके सब लोग दुष्टों तथा छद्म का आचरण करनेवालों को दूर हटाकर, सज्जनों की सङ्गति करके स्वयं को और समाज को उन्नत करें ॥३॥
Subject
आगे फिर जीवात्मा और परमात्मा का विषय है।