Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1563

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
क्ष꣣पो꣡ रा꣢जन्नु꣣त꣢꣫ त्मनाग्ने꣣ व꣡स्तो꣢रु꣣तो꣡षसः꣢꣯ । स꣡ ति꣢ग्मजम्भ र꣣क्ष꣡सो꣢ दह꣣ प्र꣡ति꣢ ॥१५६३॥

क्ष꣢पः । रा꣣जन् । उत꣢ । त्म꣡ना꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । व꣡स्तोः꣢꣯ । उ꣣त꣢ । उ꣣ष꣡सः꣢ । सः । ति꣢ग्मजम्भ । तिग्म । जम्भ । र꣡क्षसः꣢ । द꣣ह । प्र꣡ति꣢꣯ ॥१५६३॥

Mantra without Swara
क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः । स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति ॥

क्षपः । राजन् । उत । त्मना । अग्ने । वस्तोः । उत । उषसः । सः । तिग्मजम्भ । तिग्म । जम्भ । रक्षसः । दह । प्रति ॥१५६३॥

Samveda - Mantra Number : 1563
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (राजन्) सम्राट् (तिग्मजम्भ) तीक्ष्ण दण्डवाले (अग्ने) परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (सः) वह विविध गुणों और कर्मों से सुशोभित आप (त्मना) स्वयम् (क्षपः) रात्रि में, (वस्तोः) दिन में, (उत) और (उषसः) उषाकालों में (रक्षसः) ब्रह्मचर्य-विरोधी, विद्या-विरोधी और सच्चरित्र-विरोधी दुष्ट विचारों को (प्रति दह) भस्म कर दो ॥३॥
Essence
जैसे जगदीश्वर दिन-रात जागरूक होकर उपासकों के सच्चरित्र की रक्षा करता हुआ उनके काम, क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा आदि के भावों को विनष्ट करता है, वैसे ही आचार्य शिष्यों के लिए और राजा प्रजाओं के लिए करे ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राष्ट्र, मानवोद्बोधन, राजा और आचार्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पन्द्रहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर परमात्मा, आचार्य और राजा से प्रार्थना है।