Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1560

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुबुष्णिक्, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
भ꣣द्रं꣡ मनः꣢꣯ कृणुष्व वृत्र꣣तू꣢र्ये꣣ ये꣡ना꣢ स꣣म꣡त्सु꣢ सास꣣हिः꣢ । अ꣡व꣢ स्थि꣣रा꣡ त꣢नुहि꣣ भू꣢रि꣣ श꣡र्ध꣢तां व꣣ने꣡मा꣢ ते अ꣣भि꣡ष्ट꣢ये ॥१५६०॥

भ꣣द्र꣢म् । म꣡नः꣢꣯ । कृ꣣णुष्व । वृत्रतू꣡र्ये꣢꣯ । वृ꣣त्र । तू꣡र्ये꣢꣯ । ये꣡न꣢꣯ । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । सा꣣सहिः꣢ । अ꣡व꣢꣯ । स्थि꣣रा꣢ । त꣣नुहि । भू꣡रि꣢꣯ । श꣡र्ध꣢꣯ताम् । व꣣ने꣡म । ते꣢ । अभि꣡ष्ट꣢ये ॥१५६०॥

Mantra without Swara
भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये येना समत्सु सासहिः । अव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धतां वनेमा ते अभिष्टये ॥

भद्रम् । मनः । कृणुष्व । वृत्रतूर्ये । वृत्र । तूर्ये । येन । समत्सु । स । मत्सु । सासहिः । अव । स्थिरा । तनुहि । भूरि । शर्धताम् । वनेम । ते । अभिष्टये ॥१५६०॥

Samveda - Mantra Number : 1560
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य ! तू (वृत्रतूर्ये) जिसमें उपद्रवियों का वध किया जाता है, ऐसे सङ्ग्राम में (मनः) अपने मन को (भद्रम्) भद्र (कृणुष्व) बना, (येन) जिस मन से, तू (समत्सु) युद्धों में (सासहिः) शत्रुओं के छक्के छुड़ानेवाला होता है। (शर्धताम्) उपद्रवी शत्रुओं के (भूरि) बहुत से (स्थिरा) स्थिर बलों को (अवतनुहि) नीचा दिखा दे। हम (ते) तेरी (अभिष्टये) अभीष्ट-प्राप्ति के लिए (वनेम) मिलकर प्रयत्न करें ॥२॥
Essence
भद्र मन से ही युद्ध करके ऐसा यत्न करना चाहिए कि शत्रु भी भद्र हो जाएँ, यदि भद्र न हों तो उन्हें विश्वहित के लिए बाँधकर कारागार में डाल दे या उनका वध कर दे ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में मनुष्य को उद्बोधन दिया गया है।