Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1556

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡दा꣢भ्यः पुरए꣣ता꣢ वि꣣शा꣢म꣣ग्नि꣡र्मानु꣢꣯षीणाम् । तू꣢र्णी꣣ र꣢थः꣣ स꣢दा꣣ न꣡वः꣢ ॥१५५६॥

अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः । पुरएता꣢ । पु꣣रः । एता꣢ । वि꣣शा꣢म् । अ꣣ग्निः꣢ । मा꣡नु꣢꣯षीणाम् । तू꣡र्णिः꣢꣯ । र꣡थः꣢꣯ । स꣡दा꣣ । न꣡वः꣢꣯ ॥१५५६॥

Mantra without Swara
अदाभ्यः पुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम् । तूर्णी रथः सदा नवः ॥

अदाभ्यः । अ । दाभ्यः । पुरएता । पुरः । एता । विशाम् । अग्निः । मानुषीणाम् । तूर्णिः । रथः । सदा । नवः ॥१५५६॥

Samveda - Mantra Number : 1556
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) जगन्नायक सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (अदाभ्यः) किसी से दबाया या पराजित न किया जा सकनेवाला और (मानुषीणां विशाम्) मानवी प्रजाओं के (पुर एता) आगे पहुँचनेवाला है। (रथः) इससे रचा हुआ मानव-शरीर रूप रथ (तूर्णिः) शीघ्रगामी और (सदा नवः) सदा स्तुतियोग्य होता है ॥१॥
Essence
जगदीश्वर कैसा विलक्षण शिल्पकार है कि उससे रचा हुआ आत्मा से अधिष्ठित मानव-देह-रूप रथ चेतन होता हुआ स्वयं ही चलता है, स्वयं ही रुकता है और स्वयं ही कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक करता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा का वर्णन करते हैं।