Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1554

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सुदीतिपुरुमीढौ तयोर्वान्यतरः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣡च्छा꣢ नः शी꣣र꣡शो꣢चिषं꣣ गि꣡रो꣢ यन्तु दर्श꣣त꣢म् । अ꣡च्छा꣢ य꣣ज्ञा꣢सो꣣ न꣡म꣢सा पुरू꣣व꣡सुं꣢ पुरुप्रश꣣स्त꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥१५५४॥

अ꣡च्छ꣢꣯ । नः꣣ । शीर꣡शो꣢चिषम् । शी꣣र꣢ । शो꣣चिषम् । गि꣡रः꣢꣯ । य꣣न्तु । दर्शत꣢म् । अ꣡च्छ꣢꣯ । य꣣ज्ञा꣡सः꣢ । न꣡म꣢꣯सा । पु꣣रूव꣡सु꣢म् । पु꣣रु । व꣡सु꣢꣯म् । पु꣣रुप्रशस्त꣢म् । पु꣣रु । प्रशस्त꣢म् । ऊ꣣त꣡ये꣢ ॥१५५४॥

Mantra without Swara
अच्छा नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम् । अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये ॥

अच्छ । नः । शीरशोचिषम् । शीर । शोचिषम् । गिरः । यन्तु । दर्शतम् । अच्छ । यज्ञासः । नमसा । पुरूवसुम् । पुरु । वसुम् । पुरुप्रशस्तम् । पुरु । प्रशस्तम् । ऊतये ॥१५५४॥

Samveda - Mantra Number : 1554
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(नः) हमारी (गिरः) वाणियाँ (शीरशोचिषम्) व्याप्त तेजवाले, (दर्शतम्) दर्शनीय अग्रनायक परमात्मा के (अच्छ) प्रति (यन्तु) प्रवृत्त हों। साथ ही, हमारे (यज्ञासः) उपासना-यज्ञ (ऊतये) रक्षा के लिए (नमसा) नमस्कार के साथ (पुरूवसुम्) बहुत धनवाले, (पुरुप्रशस्तम्) बहुत श्लाघ्य उस अग्नि नामक परमात्मा के (अच्छ) प्रति (यन्तु) पहुँचें ॥१॥
Essence
श्रद्धा के साथ नमस्कारपूर्वक की गयी ही परमात्मा की उपासना सफल होती है, बेमन से की गयी नहीं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमेश्वर को आत्म-समर्पण करते हैं।